Thursday, January 22, 2026
Geopolitics
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इजरायल ले जाने में देरी: भारत की यहूदी जनजातियों का क्या होगा?

Navbharat Times
January 21, 20261 day ago
भारत में रहने वाले यहूदी जनजातियों के 3300 लोगों को कब ले जाएगा इजरायल? नेतन्याहू की मंजूरी के बाद भी देरी क्यों?

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भारत में रहने वाली यहूदी जनजातियों के 3300 लोगों को इजरायल ले जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हाल ही में बेंजामिन नेतन्याहू की मंजूरी के बाद इजरायली प्रतिनिधिमंडल ने आइजोल में स्क्रीनिंग और इंटरव्यू लिए। यह प्रक्रिया लगभग एक दशक बाद हुई है। हालांकि, इजरायल में चल रहे संघर्षों के कारण इन लोगों को ले जाने में देरी हो रही है।

नई दिल्ली/तेल अवीव: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मंजूरी के बाद इजरायल ने भारत में रहने वाली यहूदी जनजातियों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी है। पिछले साल दिसंबर में 1 से 10 तारीख के बीच आइजोल में कैंप लगाकर करीब 3,300 आवेदकों को इंटरव्यू के बाद शॉर्टलिस्ट किया गया है। इकोनॉमिक टाइम्स की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, जिसमें आइजोल और कोलासिब में बेनी मेनाशे समुदाय के कई घरों का दौरा किया गया है और दिसंबर के इंटरव्यू में शामिल हुए तीन दर्जन से ज्यादा आवेदकों से मुलाकात की गई है, कई अहम बातें पता चली हैं। पता चला है कि इंटरव्यू का यह लेटेस्ट राउंड दो वजहों से महत्वपूर्ण था। पहला, इस बार यह प्रक्रिया सीधे इजरायल की सरकार ने चलाई थी और इसके तहत 25 सदस्यों वाले प्रतिनिधिमंडल को भेजा गया था। इस टीम का इजरायल के अलियाह और एब्जॉर्प्शन मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर-जनरल रैंक के एक अधिकारी नेतृत्व कर रहे थे। दूसरा, ये इंटरव्यू करीब एक दशक के अंतराल के बाद किए गये हैं। 2015 में इंटरव्यू किए गए प्रवासियों के आखिरी बैच को आखिरकार 2021 में शावेई इजरायल योजना के तहत इजरायल भेजा गया था। ये इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी माइकल फ्रायंड की तरफ से स्थापित एक प्राइवेट संगठन है। मौजूदा अलियाह प्रक्रिया में फ्रायंड की कोई भूमिका नहीं है। इस बार, चूंकि अलियाह चाहने वाले ज्यादातर आवेदक मणिपुर के चुराचांदपुर के कुकी समुदाय के लोग थे, इसलिए उन्हें आइजोल लाने के लिए बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की गई थी। इस काम में शामिल लोगों के मुताबिक, लगभग 10 मिनीबस और SUV ने आवेदकों को पहाड़ियों से होते हुए 10 घंटे की खतरनाक यात्रा कराई। मिजोरम पुलिस ने इजरायली प्रतिनिधिमंडल को सुरक्षा कवर प्रदान किया था, जिसमें डेयानिम—रैबिनिकल जज शामिल थे, जिन्हें चुने गए उम्मीदवारों की जांच का काम सौंपा गया था। इजरायल जाएंगे बेनी मेनाशे समुदाय के लोग जिन लोगों का इंटरव्यू लिया गया है, उनमें अलग अलग तरह के लोग शामिल हैं। उनमें 34 साल के आसफ रेंथले भी थे, जो सेंट स्टीफंस कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और उनके पास जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से MPhil की डिग्री है। इस ग्रुप में दिहाड़ी मजदूर और अमीर लोग भी शामिल थे, जैसे 65 साल के नादव हौहनार और उनकी पत्नी 62 साल की याफा, जिनके पास आइजोल के बीचों-बीच एक बड़ा चार मंजिला घर है। ज्यादातर परिवारों के कई रिश्तेदार पहले से ही इजरायल में रह रहे हैं। याफा हौहनार कहती हैं कि "जब मेरा सबसे बड़ा बेटा माइग्रेट हुआ था, तब उसकी शादी भी नहीं हुई थी।" उनका बेटा अब यरूशलेम के बाहरी इलाके में एक रेस्टोरेंट में शेफ का काम करता है। उन्होंने कहा कि "अब मेरे वहां तीन पोतियां और एक पोता है। वे सभी 2021 में हमसे मिलने आए थे। बदकिस्मती से, मेरे पोते-पोतियां मिज़ो नहीं बोल पाते।" 33 साल की रूथ हैंगसिंग ने कहा कि "मैं कोच्चि के एक रेस्टोरेंट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम कर रही थी।" उनका परिवार मिजोरम के कोलासिब जिले के हेब्रोन गांव में किराए के मकान में रहता है। उन्होंने कहा कि "जब मैंने सुना कि रब्बी आइजोल आ रहे हैं, तो मैंने नौकरी छोड़ दी और घर लौट आई।" यह पक्का नहीं होने पर कि माइग्रेट करने की उसकी बारी कब आएगी, रूथ कहती है कि वह अब अपनी मां को खियाबा - पारंपरिक कूकी हार - बनाने और बेचने में मदद कर रही है ताकि घर का खर्च चल सके। इजरायल जाने में क्यों हो रही है देरी? हालांकि पिछले महीने इंटरव्यू हुए हैं, लेकिन इनके इजरायल जाने में काफी देरी हो रही है। बनेई मेनाशे समुदाय के लिए इजरायल का रास्ता कभी आसान नहीं रहा। यह 1950 के दशक में शुरू हुआ जब मेला चाला, जो एक मिजो थे, उन्होंने इस विचार को लोकप्रिय बनाया कि मिजो लोग, इजरायल की खोई हुई जनजातियों में से एक के वंशज हैं। उन्होंने उन बातों पर ध्यान दिलाया, जिन्हें वे चिन-कूकी-मिज़ो परंपराओं और यहूदी रीति-रिवाजों के बीच चौंकाने वाली समानताएं मानते थे। यह विश्वास इतना मज़बूत था कि कुछ लोग पैदल ही इज़राइल की ओर निकल पड़े, लेकिन उन्हें असम के सिलचर में पुलिस ने रोक दिया और वापस भेज दिया। 2005 में आया इजरायल के मुख्य रब्बी ने भी औपचारिक रूप से बनेई मेनाशे को "इजराइल का बीज" बताया और यहूदी के तौर पर उन्हें मान्यता दे दी। इसी के बाद उन्हें इजरायल वापस ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। माना जा रहा है कि इजरायल लगातार संघर्षों में फंसा हुआ है, इसीलिए ये देरी हो रही है। लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअंतरराष्ट्रीय मामले एवं रक्षा पत्रकार | नवभारत टाइम्सस्थान: नई दिल्ली, भारतशिक्षाअंग्रेज़ी पत्रकारिता में स्नातक, पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय, कोलकाताप्रोफेशनल परिचयअभिजात शेखर आज़ाद एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता में 16 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वर्तमान में वे नवभारत टाइम्स में असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। उनका मुख्य फोकस अंतरराष्ट्रीय राजनीति, भू-राजनीति और रक्षा मामलों पर है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग और क्राइम बीट से की, जहाँ उन्होंने जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव हासिल किया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति, चुनावी कवरेज और रक्षा से जुड़े विषयों पर गहन रिपोर्टिंग की।विशेषज्ञता के क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीतिरक्षा एवं सैन्य मामलों का विश्लेषणभारत की रणनीतिक और कूटनीतिक भूमिकाराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चुनाव कवरेजविशेषज्ञों, राजनयिकों और रक्षा अधिकारियों के इंटरव्यू​कार्य अनुभवअभिजात शेखर आज़ाद ने कई लोकसभा चुनावों और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों सहित प्रमुख वैश्विक राजनीतिक घटनाओं को कवर किया है। उन्होंने रक्षा सहयोग, सैन्य खरीद, वैश्विक शक्ति संतुलन और सुरक्षा नीतियों से जुड़े विषयों पर विस्तृत लेख और विश्लेषण लिखे हैं। नवभारत टाइम्स से पहले वे Zee Media सहित अन्य प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने रिपोर्टिंग और संपादकीय निर्णय लेने की मजबूत नींव तैयार की।प्रमुख प्रोजेक्ट्स‘बॉर्डर-डिफेंस’ — रक्षा और रणनीतिक विषयों पर आधारित साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू सीरीज़अंतरराष्ट्रीय मामलों पर विश्लेषणात्मक और व्याख्यात्मक लेखउपलब्धियाँरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गहन विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैंप्रमुख राष्ट्रीय समाचार प्लेटफॉर्म्स पर व्यापक लेखन अनुभवनीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों के साथ संवाद पर आधारित रिपोर्टिंगदो बार मिल चुका है प्रतिष्ठित ENBA अवार्ड... और पढ़ें

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    यहूदी जनजातियों को इजरायल ले जाना: नेतन्याहू की मंजूरी के बाद देरी क्यों?