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तेल की कीमतों में नरमी: रूस-यूक्रेन युद्ध या ईरान संकट, भारत के लिए खुशखबरी क्यों?
Navbharat Times
January 18, 2026•4 days ago
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ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले की आशंका कम होने से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई है। विश्लेषकों का मानना है कि आपूर्ति मांग से अधिक है, जिससे कीमतें और गिर सकती हैं। यह भारत के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि आयात बिल कम होगा, रुपया मजबूत होगा और महंगाई पर लगाम लगेगी।
नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतों में दोबारा नरमी का रुख है। यह गिरावट अमेरिका की ओर से ईरान पर संभावित हमलों की आशंका खत्म होने के कारण आई है। इससे पहले ब्रेंट क्रूड और WTI (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) कई महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे। यह साल के लिए मंदी की भविष्यवाणी को गलत साबित कर रहा था। व्यापारी भू-राजनीति और बुनियादी बातों के बीच उलझे गए थे। बाजार की असल स्थिति की बात करें तो ज्यादातर विश्लेषक अब इस बात पर सहमत हैं कि कच्चे तेल की सप्लाई मांग से काफी ज्यादा है। गोल्डमैन सैक्स ने हाल ही में 2026 के लिए अपनी कीमतों की भविष्यवाणी बदली है। उसने कहा है कि उसे उम्मीद है कि ब्रेंट क्रूड की कीमत और भी कम हो जाएगी। यह भारत के लिए अच्छा है। वह अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा तेल आयात करता है।
शायद पिछले कुछ दिनों में तेल के लिए तेजी लाने वाला फैक्टर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह संकेत था कि वह ईरान के खिलाफ सैन्य हमले की संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति के इस संकेत को जल्द ही इस आउटलुक ने बदल दिया कि ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों पर अपनी कार्रवाई कम कर रही है। इससे सैन्य हमले की संभावना कम हो गई है। यहीं से तेल की कीमतों में गिरावट शुरू हुई और आज भी जारी है। यह इस बात का प्रमाण है कि तेल बाजार में अतिरिक्त सप्लाई की कहानी हावी है। यानी कोई फैक्टर नहीं है जो इस गिरावट को रोक सके। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) जैसे भविष्यवक्ता आगे भी सप्लाई बढ़ने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। ऐसा तब हो रहा है जब ओपेक ने 2022 में कीमतों को सहारा देने के लिए लागू किए गए उत्पादन कटौती को वापस लेने की प्रक्रिया को रोक दिया है।
भारत के लिए क्यों है खुशी की वजह?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। अपनी जरूरत का लगभग 88% हिस्सा वह आयात करता है। ऐसे में क्रूड की कीमतों का सीधा संबंध भारत की रसोई से लेकर उसकी तिजोरी तक है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है। इस कारण रुपया कमजोर होता है। देश का राजकोषीय घाटा गहरा जाता है। इसके चलते माल ढुलाई महंगी हो जाती है। रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। पेंट, टायर और एयरलाइन जैसे उद्योगों की लागत बढ़ने से शेयर बाजार पर भी दबाव महसूस होता है।
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती सप्लाई और गिरती कीमतें भारत के लिए एक 'आर्थिक वरदान' की तरह हैं। अगर कच्चा तेल $50 से $60 प्रति बैरल के आसपास बना रहता है तो इससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट आएगी। इससे महंगाई पर लगाम लगेगी। सरकार को बुनियादी ढांचे पर खर्च करने के लिए अधिक बजट मिलेगा। कम कीमतों की वजह से भारत को अपनी विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलती है।
कैसे सप्लाई और डिमांड पर पड़ रहा है असर?
गोल्डमैन सैक्स ने इस हफ्ते कहा, '2026 में ग्लोबल तेल भंडार का बढ़ना और हमारे 23 लाख बैरल प्रति दिन (mb/d) के अतिरिक्त आपूर्ति के अनुमान के अनुसार, बाजार को संतुलित करने के लिए 2026 में तेल की कीमतों में गिरावट की जरूरत होगी। इससे गैर-ओपेक की सप्लाई बढ़ोतरी धीमी होगी और मांग मजबूत होगी। यह तब तक होगा जब तक कि बड़ी सप्लाई में बाधा न आए या ओपेक उत्पादन में कटौती न करे।' यह सब तब हो रहा था जब ईरान में विरोध प्रदर्शन पहले से ही सुर्खियां बटोर रहे थे और तेल की कीमतों को बढ़ा रहे थे।
दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से वेनेजुएला के तेल उद्योग पर प्रभावी नियंत्रण का कीमतों पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ा है। इस हफ्ते वाशिंगटन के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया कि अमेरिका ने वेनेजुएला के कच्चे तेल का पहला बैच 500 मिलियन डॉलर में बेचा है। आगे भी बिक्री जारी रहेगी। बुनियादी बातों के लिहाज से यह मंदी के मूड को मजबूत करता है। हालांकि, तेल उद्योग के अधिकारियों के बयानों ने वेनेजुएला के तेल उत्पादन में तेजी से सुधार की संभावना के बारे में सावधानी बरतने की सलाह दी है। इसने इस मंदी के मूड को कुछ हद तक रोका है।
इस बीच, काला सागर में तीन टैंकरों पर ड्रोन हमलों ने सप्लाई में बाधा की चिंता को और बढ़ा दिया है। यह ईरान से तेल प्रवाह में संभावित व्यवधान की उम्मीदों के साथ जुड़ गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में एक अज्ञात सूत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि कजाकिस्तान में जनवरी के पहले दो हफ्तों में उसके तेल उत्पादन में 35% की गिरावट आई है। यह गिरावट यूक्रेन की सेना की ओर से कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम पर हमलों सहित अन्य हमलों के कारण हुई है। कजाकिस्तान ने काला सागर में तेल परिवहन को सुरक्षित करने में मदद के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ से अपील की है।
यूरोपीय संघ की बात करें तो इस हफ्ते ऐसी खबरें सामने आईं कि ब्रुसेल्स रूसी तेल पर अपनी मूल्य सीमा को और कम करने की योजना बना रहा है। इसका मकसद पश्चिमी बीमा कवरेज को मूल्य सीमा से जोड़कर रूस के तेल राजस्व को कम करना है। अगली महीने से मूल्य सीमा का नया स्तर 44.10 डॉलर प्रति बैरल तय किया जाएगा। अब तक मूल्य सीमाओं ने रूसी बजट को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया है। लेकिन, यूरोपीय संघ उन्हें रूस की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और यूक्रेन से पीछे हटने के लिए मजबूर करने का एक कारगर तरीका मानता है।
लेखक के बारे मेंअमित शुक्लाअमित शुक्ला, नवभारत टाइम्स डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं। वह 18 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, शेयर मार्केट, राजनीति, देश-विदेश, प्रॉपर्टी, करियर जैसे तमाम विषयों को कवर किया है। पत्रकारिता और जनसंचार में PhD करने वाले अमित शुक्ला 7 साल से भी ज्यादा समय से टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड के साथ जुड़े हैं। टाइम्स इंटरनेट में रहते हुए नवभारतटाइम्स डॉट कॉम से पहले इकनॉमिकटाइम्स डॉट कॉम में सेवाएं दीं। उन्होंने टीवी टुडे नेटवर्क, दैनिक जागरण, डीएलए जैसे मीडिया संस्थानों के अलावा शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी काम किया है। इनमें शिमला यूनिवर्सिटी- एजीयू, टेक वन स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (नोएडा) शामिल हैं। लिंग्विस्ट के तौर पर भी पहचान बनाई है। मार्वल कॉमिक्स ग्रुप, सौम्या ट्रांसलेटर्स, ब्रह्मम नेट सॉल्यूशन, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी और लिंगुअल कंसल्टेंसी सर्विसेज समेत कई अन्य भाषा समाधान प्रदान करने वाले संगठनों के साथ फ्रीलांस काम किया।... और पढ़ें
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