Geopolitics
10 min read
सऊदी अरब और UAE के बीच क्यों बढ़ी तनातनी? मध्य पूर्व में 'कोल्ड वार' का साया
Times Now Navbharat
January 20, 2026•2 days ago

AI-Generated SummaryAuto-generated
सऊदी अरब और यूएई के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर तनातनी बढ़ी है। सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र में अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहता है, जिसे यूएई जैसे देश चुनौती दे रहे हैं। यमन में सैन्य हस्तक्षेप के दौरान यह मतभेद खुलकर सामने आया, जब यूएई ने अलगाववादियों का समर्थन किया, जिसे सऊदी अरब ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना।
सऊदी अरब जो कि अपनी आबादी, धार्मिक महत्व एवं भू-राजनीतिक प्रभाव के चलते गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (GCC) और खाड़ी मुस्लिम देशों का स्वाभाविक नेता मानता है। उसके इस 'एकाधिकार स्थापित' करने वाले रवैए को खाड़ी के अन्य छोटे लेकिन अमीर देश पसंद नहीं कर रहे हैं। वे सऊदी अरब के प्रभाव से निकलकर अपनी एक रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं। सऊदी अरब और यूएई के बीच इस 'कोल्ड वार' के पीछे यही मुख्य वजह बताई जा रही है।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद के बीच अच्छी दोस्ती रही है लेकिन इस दोस्ती में एक तरह से दरार पैदा हो गई है। दोनों देशों के बीच वर्चस्व एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो गया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तनाव एक दिन में पैदा नहीं हुआ है बल्कि इसके पीछे क्षेत्र में अपनी 'श्रेष्ठता, प्रभुत्व एवं दबदबा' कायम करने की सऊदी अरब की एकाधिकार है जिसे यूएई जैसे चुनौती देना चाहते हैं।
दरअसल, सऊदी-UAE की प्रतिद्वंद्विता काफी हद तक पर्दे के पीछे रही है, लेकिन 2019 में यमन में उनके संयुक्त सैन्य हस्तक्षेप के दौरान इसमें दरारें दिखाई देने लगीं। शुरुआत में दोनों देश ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ एकजुट थे, लेकिन अबू धाबी ने धीरे-धीरे अपना ध्यान दक्षिणी यमन की ओर मोड़ लिया और अलगाववादी साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) का समर्थन करने लगा। इसके विपरीत, रियाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के तहत यमन की क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध रहा।
यह मतभेद 2025 के अंत में खुली तनातनी में बदल गया। रिपोर्टों के मुताबिक दिसंबर की शुरुआत में यूएई समर्थित एसटीसी बलों ने दक्षिणी और पूर्वी यमन के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया, जिससे वे सऊदी सीमा के करीब पहुंच गए। रियाद ने इस बढ़त को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा माना। कई हफ्तों तक असफल कूटनीतिक दबाव के बाद, सऊदी अरब ने एक हथियार खेप पर हवाई हमले किए, जिसके बारे में उसका कहना था कि वह एसटीसी के लिए थी, और सार्वजनिक रूप से यूएई पर एक रणनीतिक 'रेड लाइन' पार करने का आरोप लगाया।
इस घटना ने सऊदी अरब और यूएई के बीच तनाव बढ़ाने का काम किया। दोनों देशों के मतभेद और तकरार खुलकर सामने आ गए। हालांकि यूएई ने एसटीसी की कार्रवाई को नियंत्रित करने से इंकार किया और यमन से अपने शेष सैनिकों की वापसी की घोषणा की, लेकिन सऊदी समर्थित बलों ने तेजी से हालात पलट दिए। इसके बाद एसटीसी को एक राजनीतिक ताकत के रूप में हाशिये पर डाल दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब ने दक्षिणी यमन में 500 मिलियन डॉलर की विकास परियोजनाओं की घोषणा की, जिनमें से कई उन इलाकों में थीं जो पहले यूएई के प्रभाव में थे।
यही नहीं रियाद और अबू धाबी के बीच क्षेत्रीय शक्ति को लेकर बुनियादी मतभेद हैं। विजन 2030 से प्रेरित सऊदी अरब अपनी सीमाओं पर स्थिरता और खाड़ी क्षेत्र में वर्चस्व चाहता है, ताकि वह अपनी अर्थव्यवस्था में विविधता ला सके, निवेश आकर्षित कर सके और खुद को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सके। रियाद के नजरिये से, यमन, सूडान, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और रेड सी क्षेत्र में यूएई समर्थित प्रॉक्सी और हस्तक्षेप इस लक्ष्य को कमजोर करते हैं।
एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की डॉ. मीरा अल-हुसैन ने द न्यू अरब से कहा कि सऊदी अरब अब यूएई की विदेश नीति को केवल मतभेद के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे के रूप में देखने लगा है। उनका तर्क है कि अब्राहम समझौतों के तहत इजराजल से जुड़े अमीराती प्रोजेक्ट्स ने सऊदी आशंकाओं को और बढ़ा दिया है, खासकर इजरायली ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म्स पर चल रही अपुष्ट रिपोर्टों के बीच, जिनमें सऊदी-यूएई सीमा के पास संभावित इजरायली सैन्य ठिकानों का जिक्र किया जा रहा है।
Rate this article
Login to rate this article
Comments
Please login to comment
No comments yet. Be the first to comment!
