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रॉबर्ट कियोसाकी की चांदी पर बड़ी चेतावनी: चीन, भारत और रूस की तैयारी क्या है?
Navbharat Times
January 20, 2026•2 days ago
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रॉबर्ट कियोसाकी ने चेतावनी दी है कि चीन, भारत और रूस बड़े पैमाने पर चांदी खरीद रहे हैं, जो 21वीं सदी की अहम धातु की घटती आपूर्ति और डॉलर पर घटते भरोसे के कारण एक बड़ी तैयारी का संकेत है। चांदी का उपयोग विभिन्न महत्वपूर्ण उद्योगों में होता है और यह रणनीतिक शक्ति का प्रतीक बन गई है।
नई दिल्ली: चांदी की उड़ती कीमतों के बीच जाने-माने लेखक और निवेशक रॉबर्ट कियोसाकी ने फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर किया है। इसमें उन्होंने चांदी पर अपनी राय साझा की है। उन्होंने बताया कि दुनिया के तीन बड़े देश - चीन, भारत और रूस - धड़ल्ले से चांदी खरीद रहे हैं। यह सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि एक बड़ी तैयारी का संकेत है। कियोसाकी के अनुसार, ये देश 21वीं सदी की सबसे अहम धातु चांदी को इसलिए जमा कर रहे हैं क्योंकि इसकी सप्लाई कम हो रही है। डॉलर पर भरोसा भी घट रहा है। जब सरकारें किसी धातु के लिए आपस में होड़ करती हैं तो यह सट्टा नहीं है। इसके बजाय अस्तित्व की लड़ाई होती है। कियोसाकी मानते हैं कि चांदी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति है। आज के आधुनिक युग में सोना न हो तो भी अर्थव्यवस्था चल सकती है। लेकिन, चांदी के बिना यह संभव नहीं है।
कियोसाकी ने अपने पोस्ट की शुरुआत एक सवाल के साथ की। सवाल किया- चीन, भारत और रूस इतनी ज्यादा चांदी क्यों खरीद रहे हैं? उन्हें ऐसा क्या दिख रहा है जो अमेरिकियों को नहीं दिख रहा? रिच डैड पुअर डैड के लेखक ने बताया, चांदी का इस्तेमाल सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सैन्य उपकरण, पानी साफ करने के यंत्र, AI हार्डवेयर, बिजली के इंफ्रास्ट्रक्चर और मेडिकल उपकरणों में होता है। यह सबसे अच्छी बिजली पहुंचाने वाली धातु है। सोने के उलट, चांदी इस्तेमाल होने के बाद खत्म हो जाती है, यानी इसका दोबारा इस्तेमाल (रीसायकल) बहुत कम होता है। इस वजह से दुनिया में चांदी की सप्लाई धीरे-धीरे कम हो रही है। जब सप्लाई कम हो रही हो और दुनिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही हो तो बड़े देश तेजी से कदम उठा रहे हैं।
चीन को नहीं पश्चिमी देशों पर भरोसा
कियोसाकी ने लिखा, चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चांदी उत्पादक है। वह अब पेरू जैसे देशों से सीधे खदानों से चांदी खरीद रहा है ताकि वह बाजार में आने से पहले ही उसे अपने कब्जे में ले ले। वे पश्चिमी देशों की कीमत से दोगुना दाम देकर भी चांदी खरीद रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि चीन पश्चिमी देशों के एक्सचेंज, वॉल्ट (जमा करने की जगह) और सेटलमेंट सिस्टम पर भरोसा नहीं करता। वे चाहते हैं कि चांदी चीन के अंदर ही रहे, चीन में ही रिफाइन हो और चीन के कंट्रोल में रहे। यह एक बहुत बड़ा संकेत है। देश ऐसा तब करते हैं जब वे सप्लाई में अचानक कमी, व्यापार में रुकावट, करेंसी की अस्थिरता या ऐसी दुनिया के लिए तैयारी कर रहे होते हैं जहां अमेरिकी डॉलर का दबदबा खत्म हो जाएगा। जब कोई देश किसी मेटल को किसी भी कीमत पर जमा कर रहा होता है तो वह निवेश नहीं कर रहा होता, बल्कि तैयारी कर रहा होता है।
कियोसाकी ने कहा कि भारत की चांदी की खरीद तो और भी बड़ी है। पिछले पांच सालों में भारत ने 90 करोड़ औंस से ज्यादा चांदी खरीदी है। यह इतनी ज्यादा है कि लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन (LBMA) ने भी उतने समय में इतनी चांदी का कारोबार नहीं किया। यह क्यों मायने रखता है? इसलिए क्योंकि भारत तेजी से सोलर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन, रक्षा क्षमता और अपनी आबादी को बढ़ा रहा है। इन सभी क्षेत्रों के लिए चांदी रीढ़ की हड्डी की तरह है। भारत चांदी की कीमत पर दांव नहीं लगा रहा, बल्कि अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित कर रहा है।
रूस भी खेल में हो गया है शामिल
कियोसाकी के मुताबिक, अब रूस भी इस खेल में शामिल हो गया है। रूस पहला बड़ा देश है जिसने खुले तौर पर कहा है कि वह रणनीतिक सरकारी उद्देश्यों के लिए चांदी जमा कर रहा है। यह निवेश या सट्टेबाजी के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है। जब कोई सरकार किसी वस्तु को 'रणनीतिक' कहती है तो इसका मतलब है कि वे कमी, कीमतों में अचानक उछाल और भू-राजनीतिक संघर्ष की उम्मीद कर रहे हैं। साथ ही, वे विदेशी करेंसी पर भरोसा नहीं करते। यह तब होता है जब वैश्विक मौद्रिक प्रणालियां अपने अंतिम चरण में होती हैं।
कियोसाकी ने कहा, हमने इतिहास में ऐसा पहले भी देखा है। इतिहास खुद को दोहराता नहीं है, लेकिन उसकी गूंज सुनाई देती है। जब देशों का प्रमुख मुद्राओं पर से भरोसा उठ जाता है तो वे ठोस संपत्तियों की ओर भागते हैं। 1960 के दशक में, जब अमेरिकी डॉलर कमजोर हो रहा था तो लोग असली धातु (चांदी) को जमा करने लगे और चांदी के सिक्के चलन से गायब हो गए। (इसे ग्रेशम का नियम कहते हैं: खराब पैसा अच्छे पैसे को बाहर कर देता है।) 1970 के दशक में जब डॉलर को सोने से अलग कर दिया गया तो अमेरिका में महंगाई बढ़ने के साथ चांदी की कीमत आसमान छू गई। 1920 के दशक की शुरुआत में जर्मनी में मुद्रा का पतन हुआ था, तब कागज के नोट बेकार हो गए थे। लेकिन, औद्योगिक धातुओं जैसी ठोस संपत्तियों ने अपना मूल्य बनाए रखा। जब भी कोई मुद्रा कमजोर होती है तो असली चीजें (ठोस संपत्तियां) ऊपर जाती हैं। आज अमेरिकी डॉलर कमजोर है, दुनिया का भरोसा डगमगा रहा है और महंगाई लगातार बनी हुई है। ऐसे में दुनिया का चांदी की ओर आकर्षित होना कोई हैरानी की बात नहीं है।
क्या है मतलब?
कियोसाकी ने इसका अमेरिकी लोगों के लिए मतलब बताया। उन्होंने कहा, जब दुनिया की तीन सबसे बड़ी ताकतें - जो दुनिया की 40% आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं - वैश्विक चांदी की सप्लाई को खत्म करना शुरू कर देती हैं तो यह सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। चांदी अब सिर्फ एक निवेश नहीं रह गई है। यह एक रणनीतिक भंडार, एक भू-राजनीतिक संपत्ति, एक राष्ट्रीय सुरक्षा संसाधन और कमजोर होते डॉलर के खिलाफ एक बचाव (हेज) बनती जा रही है। वहीं, आम अमेरिकी के पास चांदी नहीं है। अमेरिकी संपत्ति का 1% से भी कम हिस्सा कीमती धातुओं में लगा है। जब आम लोग स्टॉक, क्रिप्टो और सुर्खियों के पीछे भाग रहे होते हैं तो सरकारें पर्दे के पीछे चांदी जमा कर रही होती हैं। यह आपको सब कुछ बता देना चाहिए। चांदी अब सिर्फ एक वस्तु नहीं है। यह एक भू-राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि क्या चांदी एक अच्छा निवेश है? असली सवाल यह है, 'चीन, भारत और रूस उस भविष्य की तैयारी क्यों कर रहे हैं जिस पर अमेरिकी ध्यान भी नहीं दे रहे हैं? और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि... क्या आप भी इसकी तैयारी कर रहे हैं?
लेखक के बारे मेंअमित शुक्लाअमित शुक्ला, नवभारत टाइम्स डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं। वह 18 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, शेयर मार्केट, राजनीति, देश-विदेश, प्रॉपर्टी, करियर जैसे तमाम विषयों को कवर किया है। पत्रकारिता और जनसंचार में PhD करने वाले अमित शुक्ला 7 साल से भी ज्यादा समय से टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड के साथ जुड़े हैं। टाइम्स इंटरनेट में रहते हुए नवभारतटाइम्स डॉट कॉम से पहले इकनॉमिकटाइम्स डॉट कॉम में सेवाएं दीं। उन्होंने टीवी टुडे नेटवर्क, दैनिक जागरण, डीएलए जैसे मीडिया संस्थानों के अलावा शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी काम किया है। इनमें शिमला यूनिवर्सिटी- एजीयू, टेक वन स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (नोएडा) शामिल हैं। लिंग्विस्ट के तौर पर भी पहचान बनाई है। मार्वल कॉमिक्स ग्रुप, सौम्या ट्रांसलेटर्स, ब्रह्मम नेट सॉल्यूशन, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी और लिंगुअल कंसल्टेंसी सर्विसेज समेत कई अन्य भाषा समाधान प्रदान करने वाले संगठनों के साथ फ्रीलांस काम किया।... और पढ़ें
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