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रिकॉर्ड बर्फ़बारी: हिमालय से दिल्ली तक खतरे का संकेत, तापमान वृद्धि ने बिगाड़ी तस्वीर
AajTak
January 18, 2026•4 days ago

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हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण बर्फबारी कम हो रही है, जिससे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पर्यटन प्रभावित हो रहा है। जनवरी में बुरांश के फूल खिलना और जंगलों में आग लगना चिंताजनक संकेत हैं, जो पानी के संकट और खेती पर खतरे की ओर इशारा करते हैं। पश्चिमी विक्षोभ की देरी और उत्तर की ओर खिसकने से रूस-चीन में भारी बर्फबारी हो रही है, जबकि हिमालय सूखा झेल रहा है।
रूस में बर्फ़बारी ने 146 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. मॉस्को और पूर्वी रूस के केमचटका पेनिनसुला में बर्फ़बारी के चलते ज़िंदगी ठप पड़ गई है. कुछ ही दिनों में इतनी बर्फ़बारी हुई है, जितनी आमतौर पर महीनों में हुआ करती थी. उधर उत्तर-पूर्वी चीन में भी बर्फ़बारी ने ज़िंदगी की रफ़्तार पर रोक लगा दी है.
लेकिन अगर बात हिंदुस्तान की करें तो जम्मू-कश्मीर के ऊंचे इलाकों में जहां बर्फ़बारी लोगों को आकर्षित कर रही है, वहीं हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में इस बार बर्फ़बारी लोगों को मायूस कर रही है. जनवरी के दो हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी उत्तराखंड में विंटर टूरिज़्म की राजधानी कहे जाने वाले औली बर्फ़बारी के लिए तरस गया है. वहीं पर्यटकों की पहली पसंद कहे जाने वाले नैनीताल में भी सूखा पसरा है.
पर्यटन पर असर और मौसम से उलट बुरांश के फूल
बर्फ़बारी न होने के चलते सैलानी न तो औली जा रहे हैं और न ही नैनीताल जाना पसंद कर रहे हैं. इतना ही नहीं, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मशहूर बुरांश के पेड़ों में अभी से फूलों की लाली दिखने लगी है. जो देखने में तो ख़ूबसूरत है, लेकिन वैज्ञानिक नज़रिए से यह शुभ संकेत नहीं है.
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जनवरी में खिला बुरांश, बढ़ते तापमान की चेतावनी
बुरांश उत्तराखंड का राज्य पुष्प है और ऊँचाई व मौसम के आधार पर इसमें फूल खिलते हैं. आमतौर पर इनमें फूल फ़रवरी के अंत से खिलना शुरू होते हैं, जब तापमान बढ़ने लगता है. लेकिन जनवरी के महीने में ही बुरांश के पेड़ों में खिले हुए फूल इस बात की गवाही दे रहे हैं कि तापमान बढ़ रहा है. यानी बर्फ़बारी के मौसम में अगर इन पेड़ों में फूल खिलने लगें तो कहीं न कहीं यह एक चेतावनी है.
बर्फ़ की जगह जंगलों में आग
इतना ही नहीं, जिन पहाड़ों को बर्फ़ से ढका होना चाहिए था, वहां जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं. शनिवार को चाई गांव में ज्योतिर्मठ के पास पहाड़ी जंगलों में आग देखी गई. वहीं तीन दिन पहले फूलों की घाटी इलाके में बदरीनाथ के पास भी जंगलों में आगज़नी की घटना हुई. जो पहाड़ आमतौर पर जनवरी में बर्फ़ से ढके रहते थे, वहां आग की लपटें और धुआं दिखाई दिया.
यह भी पढ़ें: मास्को में सफेद चादर... बर्फबारी ने तोड़ा 146 साल का रिकॉर्ड
पानी के संकट और खेती पर मंडराता खतरा
ऐसी घटनाएं किन्नौर से भी सामने आई हैं. चिंता इस बात की है कि अगर बर्फ़बारी नहीं हुई तो आसपास के इलाकों में पानी के सोते सूख जाएंगे, पहाड़ों पर नमी खत्म हो जाएगी और मार्च से पड़ने वाली गर्मी के बाद खेती के लिए ज़रूरी पानी मिलना भी मुश्किल हो जाएगा. विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि इस बार गर्मियों में पानी कहां से आएगा.
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पूरे उत्तर भारत में सूखा दिसंबर
हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक पहाड़ों पर सफ़ेद बर्फ़ की चादर नहीं, बल्कि बिना बर्फ़ के बेरंग पहाड़ दिखाई दे रहे हैं. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने दिसंबर में उत्तरी भारत के लगभग सभी हिस्सों में किसी भी प्रकार का वर्षण (बारिश या हिमपात) दर्ज नहीं किया.
रूस-चीन में बर्फ़, हिमालय में सूखा क्यों?
वैज्ञानिक मानते हैं कि धीरे-धीरे सब-ट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम उत्तर की तरफ़ सक्रिय हो रही है, जिसकी वजह से रूस और चीन में भारी बर्फ़बारी हो रही है. मौसम वैज्ञानिक और स्काइमेट के वाइस प्रेसिडेंट महेश पलावत कहते हैं, "पिछले एक-दो सालों से ऐसा हो रहा है, इसलिए इसे ग्लोबल वार्मिंग का प्रत्यक्ष असर कहना फ़िलहाल सही नहीं है. लेकिन यह ज़रूर है कि लगातार बढ़ते तापमान के चलते भूमध्य सागर से आने वाली सब-ट्रॉपिकल वेस्टर्न डिस्टर्बेंस धीरे-धीरे उत्तर की ओर खिसक रही है, जिसका असर रूस और चीन में भारी बर्फ़बारी के रूप में दिखाई दे रहा है."
18 जनवरी से मजबूत पश्चिमी विक्षोभ की संभावना
मौसम विभाग के मुताबिक़ 18 जनवरी से दो पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो रहे हैं, जो अब तक के सबसे स्ट्रॉन्ग वेस्टर्न डिस्टर्बेंस माने जा रहे हैं और ये लगातार एक के बाद एक आएंगे. इसके चलते जनवरी के अंत तक जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, मुज़फ़्फ़राबाद के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊँचाई वाले इलाकों में भारी से बहुत भारी बर्फ़बारी की संभावना है. इतना ही नहीं, 23 से 25 जनवरी के बीच उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में बारिश की भी संभावना जताई गई है.
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वेस्टर्न डिस्टर्बेंस में लगातार हो रही देरी
पिछले साल भी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस में देरी हुई थी और पश्चिमी विक्षोभ दिसंबर के दूसरे हफ्ते में सक्रिय हुआ था. लेकिन साल 2025 में पश्चिमी विक्षोभ जनवरी के दूसरे हफ्ते में शुरू हुआ है और इसके फ़रवरी तक सक्रिय रहने की संभावना है, जबकि आमतौर पर पश्चिमी विक्षोभ नवंबर से ही सक्रिय हो जाता है.
हॉर्टिकल्चर और फलों की खेती पर असर
इस बार पहाड़ों पर कम बर्फ़बारी होने की वजह से यह आशंका भी जताई जा रही है कि इसका असर हॉर्टिकल्चर और फलों की खेती पर पड़ेगा. दिसंबर और जनवरी में अब तक पहाड़ी इलाकों में अच्छी बारिश और बर्फ़बारी दोनों नहीं हुई है.
आईपीसीसी की चेतावनी: इकोलॉजी और अर्थव्यवस्था पर असर
इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के सदस्य अंजल प्रकाश कहते हैं कि बर्फ़बारी के पैटर्न में हो रहा यह बदलाव गहरे इकोलॉजिकल और आर्थिक प्रभाव दिखाएगा. इसकी वजह से आने वाले स्प्रिंग सीज़न में नदियों में बर्फ़ पिघलने से बनने वाले जलस्तर में फ़र्क दिखाई देगा. साथ ही हाइड्रो पावर और पीने के पानी की समस्या भी खड़ी हो सकती है. पर्वतीय इलाकों में सेब के बागानों पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि नमी कम हो जाएगी.
हिमालय में तेज़ी से बदल रहा स्नो पैटर्न
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बढ़ते तापमान के चलते भूमध्य सागर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभ धीरे-धीरे उत्तर की ओर शिफ़्ट हो रहे हैं और पिछले तीन दशकों से यह रुझान लगातार देखा जा रहा है. मौसम वैज्ञानिक और आईपीसीसी के लेखक अंजल प्रकाश कहते हैं, "सैटेलाइट तस्वीरें बताती हैं कि जहां सतोपंथ क्षेत्र में ग्लेशियर फॉर्मेशन में कमी आ रही है, वहीं उत्तर की ओर ग्लेशियर बढ़ रहे हैं. साल 2020 से हिमालयी इलाकों में बर्फ़बारी में कमी देखी गई है, ख़ासकर निचले और मिड एलिवेशन क्षेत्रों में. बर्फ़बारी का समय भी काफ़ी कम हो गया है, जिसकी वजह से सीज़नल स्नो लाइन में बदलाव आया है. बढ़ते तापमान की वजह से स्नो लाइन धीरे-धीरे उत्तर की ओर खिसक रही है, क्योंकि पश्चिमी विक्षोभ कम और कमज़ोर होते जा रहे हैं. हिमालय में तापमान ग्लोबल एवरेज से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है."
25 प्रतिशत तक घट चुकी है सर्दियों की बर्फ़बारी
सर्दियों में होने वाली बर्फ़बारी, ख़ासकर सेंट्रल हिमालय क्षेत्र में, 1980 की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत तक कम हो चुकी है. विंटर प्रिसिपिटेशन में यह गिरावट एक बड़ी चिंता का विषय है.
हिमालय पर सबसे ज़्यादा असर
यानी ग्लोबल वार्मिंग और उसके प्रभाव के चलते बढ़ते तापमान ने भूमध्य सागर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभ को न सिर्फ़ कमज़ोर किया है, बल्कि उसकी दिशा भी बदल दी है. साथ ही पश्चिमी विक्षोभ की संख्या में भी कमी आई है. इसी वजह से पश्चिमी विक्षोभ की दिशा धीरे-धीरे उत्तर की ओर मुड़ रही है, जिसका असर रूस और चीन में दिखाई दे रहा है. लेकिन इसका कुप्रभाव हिमालय झेल रहा है.
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आगे क्या? उम्मीद और चेतावनी दोनों
नतीजा यह है कि न सिर्फ़ नमी में कमी आई है, बल्कि बर्फ़बारी भी लगातार घट रही है. यह एक ख़तरे की घंटी है कि बर्फ़बारी के पीक मौसम में भी हिमालय के पहाड़ ज़्यादातर इलाकों में सूखे पड़े हैं.
हालांकि आगामी सप्ताह में यह पूरी संभावना है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर समेत हिमालय के ऊंचे इलाके मज़बूत पश्चिमी विक्षोभ के चलते फिर से बर्फ़ से ढक जाएं. लेकिन अगर इनकी अवधि लंबी नहीं होती, तो हिमालय में पानी के स्रोतों तक पर्याप्त नमी पहुंचना मुश्किल होगा और स्प्रिंग के बाद आने वाली गर्मियों में नदियों का स्वरूप बदला हुआ नज़र आएगा.
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