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ओवैसी का मास्टरस्ट्रोक: सेक्युलर पार्टियों को मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से बाहर किया
AajTak
January 19, 2026•3 days ago

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महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम की सफलता ने कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को मुस्लिम वोट बैंक के खेल से बाहर कर दिया है। मुस्लिम समुदाय कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों द्वारा अपने मुद्दों पर चुप्पी और कम प्रतिनिधित्व के कारण ओवैसी की पार्टी की ओर आकर्षित हो रहा है। ओवैसी मुस्लिम युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं।
हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में अपेक्षा से बेहतर नतीजे दर्ज किए हैं. पार्टी ने 15 जनवरी को हुए चुनावों में 29 में से 24 नगर निगमों में अपने उम्मीदवार उतारे थे. 13 नगर निगमों में 125 वॉर्डों में जीत हासिल की है, जो पिछले नगर निगम चुनावों में जीते गए 56 वॉर्डों की तुलना में बहुत अधिक है. इतना ही नहीं पार्टी की कुल वार्डों में जीत की संख्या एनसीपी (एस) और मनसे से ज्यादा है. कई नगर निकायों में एआईएमआईएम ने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी स्थापित पार्टियों को पीछे छोड़ दिया है.
भारतीय राजनीति में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की भूमिका को लेकर हाल के वर्षों में काफी चर्चा हुई है, खासकर 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी की पांच सीटों की जीत के बाद यह चर्चा बहुत बढ़ गई थी. अब महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में मिली सफलता ने इस चर्चा को और आगे बढ़ा दिया है. सवाल उठ रहा है कि क्या AIMIM कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (SP), राष्ट्रीय जनता दल (RJD) जैसी सेक्युलर पार्टियों का विकल्प बन रही है?
सेक्युलर पार्टियों के नेता एआईएमआईएम को BJP की 'बी-टीम'कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं. पर अब यह मजाक उन्हें भारी पड़ रहा है.जिस तरह बिहार के बाद महाराष्ट्र में इस पार्टी ने मुसलमानों में पैठ बनाई है वह राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव ही नहीं आने वाले दिनों में टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी भारी पड़ने वाला है.
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मुस्लिम समुदाय सेक्युलर पार्टियों से क्यों दूरी बना रहा है
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों और महाराष्ट्र नगर निगम और बीएमसी चुनावों स्पष्ट दिखा कि मुस्लिम समुदाय AIMIM जैसी पार्टियों को तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के मुकाबले अधिक पसंद कर रहा है.
सेक्युलर पार्टियां मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों (मॉब लिंचिंग, बुलडोजर एक्शन, हिजाब-मस्जिद विवाद, वक्फ बिल) पर खुलकर बोलने से हिचकती हैं. उन्हे लगता है कि हिंदू वोटर्स इससे नाराज हो जाएंगे. इस प्रकार का डर विशेषकर बीजेपी के उत्थान के बाद सेक्युलर पार्टियों में लगातार बढ़ रहा है. ओवैसी जैसे नेताओं ने मुसलमानों में यह भावना पैदा की है कि वे सिर्फ 'वोट बैंक' नहीं हैं. ओवैसी जैसे नेता इन मुद्दों पर बेबाकी से बोलते हैं, जो युवाओं को आकर्षित करता है. ओवैसी बार-बार कहते रहे हैं कि ये पार्टियां मुसलमानों से दरी बिछवाने का काम करती हैं. अर्थात वोट तो लेती हैं पर उनके फायदे के लिए काम नहीं करती हैं और सत्ता में हिस्सेदारी भी नहीं देती हैं.
पिछले कुछ समय से यह भी देखा जा रहा है कि सेक्युलर पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवारों को कम टिकट देती हैं, खासकर जीतने वाली सीटों पर. बिहार 2025 में NDA और महागठबंधन दोनों ने मुस्लिम कैंडिडेट्स कम दिए. AIMIM खुद मुस्लिम लीडरशिप देती है, जिससे समुदाय को प्राइड़ फीलींग आती है.
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मुस्लिम-बहुल इलाकों में शिक्षा, रोजगार, बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है. सेक्युलर पार्टियां चुनावी वादे करती हैं, लेकिन अमल नहीं होता है. पहले मुसलमान BJP को रोकने के लिए सेक्युलर पार्टियों को वोट देते थे, लेकिन बार-बार हार और कमजोर प्रदर्शन से निराशा बढ़ी है. अब वे सोचते हैं कि विरोध में रहना ही है, तो मजबूत आवाज वाली पार्टी चुनें. ओवैसी की 'इंडियन फर्स्ट' छवि और संवैधानिक तर्क युवाओं को पसंद आते हैं. सोशल मीडिया पर ओवैसी के भाषण वायरल होते हैं, जो बौद्धिक और कॉन्फिडेंट छवि वाला नेता बनाते हैं.
औवैसी मुस्लिम युवाओं को क्यों पसंद आ रहे हैं .
ओवैसी संसद, टीवी डिबेट्स और रैलियों में मुसलमानों के मुद्दों (जैसे भेदभाव, वक्फ कानून, हिजाब, मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई) पर बिना डरे बोलते हैं. मुस्लिम समुदाय के जिन मामलों में सेक्युलर पार्टियां चुप रहती हैं, उन मुद्दों पर वो खुलकर बोलते हैं.
लंदन से बैरिस्टर की डिग्री, अच्छी अंग्रेजी और हिंदी में बहस करने की क्षमता उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाती है. वे संविधान पर आधारित तर्क देते हैं, न कि सिर्फ भावनात्मक अपील. युवा उन्हें 'इंटेलेक्चुअल रेसिस्टेंस' का प्रतीक मानते हैं. एक ऐसा नेता जो हिंदू राष्ट्रवाद के सामने डटकर खड़ा होता है, लेकिन हिंसा या चरमपंथ से दूर रहता है.
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वे शिक्षा, रोजगार, आर्थिक विकास पर फोकस करते हैं, न कि सिर्फ धार्मिक मुद्दों पर. युवा उन्हें एक ऐसा नेता मानते हैं जो मुस्लिम पहचान को राष्ट्रवाद के साथ जोड़ता है, और 'इंडियन फर्स्ट' स्टैंड लेता है. जैसे ऑपरेशन सिंदूर के वक्त वो पाकिस्तान की आलोचना करने में ओवैसी सभी सेक्युलर पार्टियों से आगे रहे.
AIMIM का उदय और सेक्युलर पार्टियों से तुलना
AIMIM की स्थापना 1927 में हुई थी, लेकिन यह मुख्य रूप से हैदराबाद-आधारित पार्टी रही. 2014 से यह राष्ट्रीय स्तर पर फैल रही है, खासकर महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में. पार्टी खुद को सेक्युलर बताती है और हिंदू उम्मीदवारों को भी टिकट देती है, जैसे 2022 के UP चुनावों में चार हिंदू कैंडिडेट्स को.
लेकिन इसका फोकस मुसलमानों, दलितों और पिछड़ों के विकास, अधिकारों और अत्याचारों पर है. बिहार में 2025 के विधानसभा चुनावों में AIMIM ने 5 सीटें जीतीं, जहां मुसलमान वोटर्स का एक हिस्सा RJD और कांग्रेस से शिफ्ट हुआ. साफ दिखने लगा है कि मुसलमान अब सेक्युलर पार्टियों को सिर्फ 'बेटर ऑप्शन' मानते हैं, न कि पहली पसंद. ओवैसी ने कुछ दिनों पहले कहा था कि मुसलमानों पर बढते अत्याचार पर सेक्युलर पार्टियों की चुप्पी ने AIMIM को मौका दिया है.
UP के 2022 के विधानसभा चुनावों में AIMIM ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था पर मुस्लिम वोटर्स ने मुख्य रूप से SP और कांग्रेस को चुना. पर क्या 2027 में भी ऐसा होगा? कहा नहीं जा सकता. UP जिन 73 सीटों पर मुसलमान आबादी 30% से ज्यादा है वहां ओवैसी के कैंडिडेट से इस बार मुसलमानों में भी उम्मीद बढ़ जाएगी.
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बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता के लिए भी खतरे की घंटी हैं ओवैसी
पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ममता बनर्जी की TMC के लिए संभावित खतरा बन सकती है. AIMIM ने बंगाल में विस्तार शुरू कर दिया है, खासकर मुस्लिम-बहुल जिलों मालदा और मुर्शिदाबाद में, जहां 20 से ज्यादा ऑफिस खोले गए हैं. पार्टी ने 'अधिकार यात्रा' के जरिए मुस्लिम वोटर्स को गोलबंद करने की योजना बनाई है. ओवैसी ने ऐलान किया कि AIMIM पूरे जोर से सभी सीटों पर लड़ेगी. उनका दावा है कि राज्य की मुस्लिम आबादी 40% से ज्यादा है पर उनको उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है.
ओवैसी का फोकस 100 से ज्यादा सीटों है, जहां मुस्लिम वोटर्स निर्णायक हैं. TMC का मुस्लिम वोट बैंक मजबूत रहा है, लेकिन हाल के असंतोष जैसे विकास की कमी, भेदभाव और रोहिंग्या मुद्दों पर चुप्पी से फायदा AIMIM को मिल सकता है. TMC से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर की नई पार्टी JUP AIMIM से गठबंधन चाहती है, जो 182 सीटों पर लड़ने की योजना बना रही है.
बिहार में AIMIM की 5 सीटों की जीत और महाराष्ट्र में 126 पार्षदों की सफलता से प्रेरित, पार्टी बंगाल में मुस्लिम-दलित गठजोड़ बना रही है. जिस तरह की भीड़ AIMIM की मीटिंग्स में उमड़ रही है वह TMC के लिए भी हैरान करने वाली है. बंगाल में अगर ओवैसी मुस्लिम वोट को 10 से 15% भी शिफ्ट करने में सफल हुए, तो TMC को दर्जनों सीटों का नुकसान हो सकता है.
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