Geopolitics
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नाटो में तनाव: ग्रीनलैंड पर यूरोप की 'बगावत' और जर्मनी की नई सेना
Hindustan
January 20, 2026•2 days ago

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जनवरी 2026 से अमेरिका-यूरोप के बीच ग्रीनलैंड को लेकर तनाव बढ़ रहा है। जर्मनी, यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनाने की ओर अग्रसर है। यह नाटो में अभूतपूर्व दरार पैदा कर रहा है, जहाँ जर्मनी 'ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस' के तहत ग्रीनलैंड में अमेरिकी हितों के खिलाफ यूरोप का साथ दे रहा है। जर्मनी 2035 तक सक्रिय सैनिकों की संख्या बढ़ाकर 2.6 लाख करने का लक्ष्य रखता है।
जनवरी 2026 का महीना वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़े भूचाल का गवाह बन रहा है। एक तरफ यूक्रेन में युद्ध जारी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के बीच 'ग्रीनलैंड' को लेकर ऐतिहासिक तनाव पैदा हो गया है। इसी बीच, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने एक ऐसा ऐलान किया है जिसने नाटो के समीकरणों को बदल कर रख दिया है। जर्मनी अब आधिकारिक तौर पर 'यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना' बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आखिर जर्मनी जो दशकों तक सैन्य मामलों में पीछे रहा अब इतना आक्रामक क्यों हो रहा है? और इसका अमेरिका-ग्रीनलैंड विवाद से क्या कनेक्शन है? आइए विस्तार से समझते हैं।
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वर्ष की शुरुआत से ही जर्मनी में 18 वर्ष के पुरुषों को सेना में सेवा के लिए अपनी शारीरिक क्षमता का अनिवार्य प्रश्नपत्र भरना पड़ रहा है। यह कदम पिछले महीने पारित एक नए कानून के तहत उठाया गया है। फिलहाल सेना में भर्ती स्वैच्छिक है, लेकिन कानून सरकार को लक्ष्य पूरा करने के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा लागू करने का अधिकार भी देता है। लक्ष्य स्पष्ट है- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेना खड़ी करना।
नवंबर में सक्रिय ड्यूटी पर तैनात सैनिकों की संख्या 184000 दर्ज की गई, जो मई से 2500 की वृद्धि है। तभी चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने संसद से कहा था कि बुंडेसवेहर को यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनना होगा। बुंडेसवेहर जर्मनी के सशस्त्र बल (सेना) का नाम है। पोट्सडाम स्थित बुंडेसवेहर के सैन्य इतिहास और सामाजिक विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ शोधकर्ता टिमो ग्राफ के अनुसार- यह काफी समय बाद सबसे बड़ा विस्तार है और 2021 के बाद की सबसे मजबूत ताकत भी। बता दें कि जर्मनी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसकी जीडीपी 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है।
ग्रीनलैंड विवाद: अमेरिका बनाम यूरोप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी मांग को फिर से हवा दे दी है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड द्वारा इसे खारिज करने के बाद, अमेरिका ने 17 जनवरी को जर्मनी, फ्रांस और डेनमार्क समेत 8 यूरोपीय देशों पर 10% आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाने का ऐलान किया, जो 1 फरवरी 2026 से लागू हो सकता है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ये टैरिफ तब तक जारी रहेंगे जब तक ग्रीनलैंड की संपूर्ण खरीद पर कोई समझौता नहीं हो जाता। अमेरिका ग्रीनलैंड को आर्कटिक में रूस और चीन के खिलाफ एक रणनीतिक किले के रूप में देखता है। इसे यूरोप ने अपनी संप्रभुता पर हमला माना है। यूरोपीय देशों का मानना है कि आज अमेरिका सहयोगी कम और एक कठोर व्यापारी की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहा है।
'ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस' और जर्मनी का रोल
अमेरिका के दबाव के आगे झुकने के बजाय, यूरोप ने अपनी सैन्य उपस्थिति ग्रीनलैंड में बढ़ा दी है। इतिहास में पहली बार, जर्मन सेना अपने देश से हजारों मील दूर एक ऐसे मिशन का हिस्सा बन रही है जो सीधे तौर पर अमेरिकी हितों के खिलाफ खड़ा है। इसे 'ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस' नाम दिया गया है। जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन की सेनाएं ग्रीनलैंड में डेनमार्क की मदद के लिए तैनात हो रही हैं। यह नाटो के भीतर एक अभूतपूर्व दरार है, जहां नाटो के ही सदस्य (अमेरिका बनाम यूरोपीय देश) एक-दूसरे के सामने खड़े हैं।
युवाओं को लुभाने के लिए मोटी पेशकश
जर्मन सरकार 23 महीने के स्वैच्छिक कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती बढ़ाने के लिए आकर्षक पैकेज दे रही है- करीब 2600 यूरो मासिक वेतन, मुफ्त आवास और स्वास्थ्य बीमा। कर-कटौती के बाद भी युवाओं के हाथ लगभग 2,300 यूरो रह जाते हैं। ये कॉन्ट्रैक्ट आगे चलकर स्थायी पेशेवर सेवा में बदले जा सकते हैं।
NATO प्रतिबद्धता: 2035 तक 2.6 लाख सक्रिय सैनिक
जर्मनी ने NATO से वादा किया है कि 2035 तक सक्रिय ड्यूटी बल 260000 किया जाएगा और रिजर्व सैनिकों की संख्या 200000 तक दोगुनी की जाएगी। इससे शीत युद्ध के अंत में मौजूद पांच लाख के करीब सैन्य शक्ति के स्तर तक पहुंच संभव होगी।
मॉस्को की नाराजगी
रूस ने इस दिशा पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। जर्मनी में रूस के राजदूत सर्गेई नेचायेव ने कहा कि जर्मनी रूस के साथ पूर्ण पैमाने के सैन्य टकराव की तैयारी तेज कर रहा है। जर्मनी के दृष्टिकोण से, रूस द्वारा यूक्रेन से सैनिक न हटाने ने रक्षा खर्च बढ़ाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति को हवा दी है। इस साल सशस्त्र बलों के पुनर्निर्माण पर 108 अरब यूरो खर्च किए जा रहे हैं- जो जीडीपी का 2.5% है और 2021 के बजट से दोगुना से भी अधिक। 2030 तक रक्षा खर्च 3.5% जीडीपी तक ले जाने की योजना है। ग्राफ के मुताबिक, रक्षा खर्च बढ़ाने के समर्थन में जनता की हिस्सेदारी एक साल में 58% से 65% हो गई।
‘2029’ का डर और सार्वजनिक राय
दिसंबर में पॉलिटबैरोमीटर के सर्वे में 80% जर्मन मानते हैं कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन शांति समझौते को लेकर गंभीर नहीं हैं। खुफिया चेतावनियों के कारण यह धारणा भी बढ़ी है कि रूस भविष्य में NATO देशों तक संघर्ष बढ़ा सकता है। ग्राफ कहते हैं- 2029 को संभावित हमले की तारीख के रूप में देखा जा रहा है। पिछले चार वर्षों में हमने खतरे की गंभीरता को समझने में देर की है- यूरोप का भविष्य दांव पर है।
अमेरिका पर भरोसा कम, ‘यूरोपीय NATO’ का विचार मजबूत
रूस के अलावा, जर्मन समाज में अमेरिका पर भरोसा घटा है। जून 2025 में ZDF के सर्वे में 73% ने माना कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा की गारंटी जारी नहीं रखेगा- दिसंबर तक यह आंकड़ा 84% पहुंच गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में यूरोप की आलोचना और दूर-दराज के राजनीतिक दलों को कथित समर्थन ने चिंताएं बढ़ाईं। यूरोप में अमेरिकी सेनाओं के पूर्व कमांडर बेन हेज्स ने इसे यूरोप के लिए अपमानजनक संदेश बताया।
नतीजतन, 60% जर्मन अब अमेरिकी परमाणु प्रतिरोध पर भी भरोसा नहीं करते, जबकि 75% इसे एंग्लो-फ्रेंच ढांचे से बदलने के पक्ष में हैं। ग्राफ के अनुसार NATO के समर्थक और EU समर्थक दोनों अब यूरोपीय NATO की धारणा पर एकजुट हो रहे हैं। बुंडेसवेहर के सर्वे बताते हैं कि यूरोपीय सेना के समर्थन में एक साल में 10 अंकों की छलांग लगकर यह 57% हो गया।
क्या जर्मनी लक्ष्य हासिल कर पाएगा?
मर्ज से पहले चांसलर ओलाफ स्कोल्ज ने भी 2022 में ऐसे ही वादे किए थे, लेकिन नौकरशाही देरी और सांस्कृतिक हिचकिचाहट के कारण रक्षा निवेश धीमा रहा। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक सेना लंबे समय तक युवाओं के लिए आकर्षक करियर नहीं मानी जाती थी, खासकर इतिहास के बोझ के कारण। हालांकि 2022 के बाद दृष्टिकोण बदला है। मर्ज के पद संभालते समय संसद पहले ही संवैधानिक घाटा सीमाएं निलंबित कर स्थायी रक्षा वृद्धि का रास्ता खोल चुकी थी। पिछले महीने लगभग 60 अरब डॉलर के रक्षा साजो-सामान की मंजूरी दी गई।
जर्मनी का यह कदम सिर्फ एक सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह पोस्ट-अमेरिकन यूरोप की तैयारी है। ग्रीनलैंड का मुद्दा सिर्फ बर्फ और जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह इस बात का इम्तिहान है कि क्या यूरोप, अमेरिका के दबाव के बिना अपने फैसले ले सकता है?
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