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कोडैक की बर्बादी: कैसे ईगो ने डुबोया अरबों का साम्राज्य?
News18 Hindi
January 19, 2026•3 days ago

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कोडक, जो कभी फोटोग्राफी का पर्याय था, अपनी ही ईगो और रील बेचने के लालच में डिजिटल क्रांति को अपनाने में विफल रहा। 1975 में कंपनी के इंजीनियर ने पहला डिजिटल कैमरा बनाया, लेकिन प्रबंधन ने इसे नजरअंदाज कर दिया। परिणाम स्वरूप, कोडक 2012 में दिवालिया हो गया, जिससे उसका अरबों का साम्राज्य समाप्त हो गया।
Written by :
Malkhan Singh
Last Updated:January 19, 2026, 16:20 IST
एक समय फोटोग्राफी के लिए केवल एक ही नाम फेमस था- कोडक (Kodak). कोडक का कैमरा, कोडक की रील. लेकिन, आज कोडक का नाम लेने वाला कोई नहीं है. कोडक को डिजिटल कैमरा ने निगल गया. आपको यह जानकर झटका लगेगा कि पहले डिजिटल कैमरा का आविष्कार कोडक कंपनी में ही हुआ था. बावजूद इसके, कंपनी ने अपनी ईगो और अपनी रील बेचने के लालच में डिजिटल टेक्नोलॉजी को नजरअंदाज कर दिया.
Why Kodak failed: अगर आप अस्सी या नब्बे के दशक में पैदा हुए हैं, तो आपको याद होगा कि घर में रखे उस कैमरे में रील डालना और फिर फोटो खिंचवाने के बाद कई दिनों तक उनके धुलकर आने का इंतजार करना एक अलग ही रोमांच होता था. उस दौर में फोटोग्राफी का मतलब था- कोडक (Kodak). और केवल भारत में ही नहीं, दुनियाभर में कोडक के कैमरा और रील चला करती थी. अरबों का साम्राज्य था, लेकिन अपनी ईगो और पुराने ढर्रे को न छोड़ने की जिद ने उन्हें घुटनों पर ला दिया. आज कैमरा या फोटोग्राफी के लिए कोडक का नाम कोई नहीं लेता. यह कंपनी क्यों फ्लॉप हुई, यह जानना अपने आप में दिलचस्प है.
कोडक की शुरुआत जॉर्ज ईस्टमैन (George Eastman) ने की थी. वो फोटोग्राफी को इतना आसान बना देना चाहते थे कि हर आम इंसान इसे इस्तेमाल कर सके. और वे अपने इस सपने को पूरा करने में सफल भी हुए. 1888 में उन्होंने पहला कैमरा पेश किया और स्लोगन दिया, “आप बस बटन दबाएं, बाकी काम हम करेंगे.” देखते ही देखते कोडक एक ग्लोबल ब्रांड बन गया. कंपनी का कमाई का तरीका थोड़ा चालाकी भरा रखा, जो कामयाब भी था. वे कैमरे तो सस्ते में बेच देते थे, लेकिन असली पैसा कमाते थे फिल्म रील, रील धोने वाले कैमिकल्स और फोटो में यूज होने वाले पेपर से. इसे ‘रेजर और ब्लेड’ मॉडल कहा जाता था. जैसे जिलेट कंपनी रेजर सस्ता देती है, लेकिन ब्लेड से पैसा कमाती है, वैसे ही कोडक का असली खजाना वो पीली रील थी, जिसे हम सब खरीदते थे.
नब्बे के दशक तक कोडक का दबदबा ऐसा था कि अमेरिका के 90 परसेंट फिल्म बाजार पर उनका कब्जा था. ‘कोडक मोमेंट’ शब्द का इस्तेमाल लोग अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों के लिए करने लगे थे. कंपनी के पास अरबों डॉलर का कैश था और हजारों टैलेंटेड लोग वहां काम करते थे.
1975 में कोडक के हाथ में था ‘मौका’
1975 में कोडक की ही लैब में काम करने वाले एक इंजीनियर स्टीव सैसन (Steve Sasson) ने कुछ ऐसी चीज बना दी, जो पूरी दुनिया को बदल सकती थी. उन्होंने एक अजीब-सी मशीन बनाई, जो टोस्टर के आकार की थी. उसमें बहुत सारे तार निकले हुए थे और यह काफी भारी थी. दरअसल, यह दुनिया का पहला ‘डिजिटल कैमरा’ था. यह कैमरा ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींचता था और उन फोटो को एक कैसेट टेप पर सेव करता था. उस फोटो को देखने के लिए कैमरा को एक टीवी से कनेक्ट करना पड़ता था. उस वक्त यह एक चमत्कार था. स्टीव सैसन ने बड़े उत्साह के साथ अपने इस आविष्कार को लेकर कोडक के बड़े अधिकारियों से बात की. उन्हें लगा कि कंपनी इस नई खोज से गदगद हो जाएगी.
कोडक में काम करने वाले स्टीव सैसन ने 1975 में पहला डिजिटल कैमरा बनाया था.
लेकिन बोर्डरूम में बैठे उन बड़े अधिकारियों के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि एक अजीब-सा डर था. उन्होंने स्टीव के उस डिजिटल कैमरे को देखा और बोले, “यह बहुत मजेदार है स्टीव, लेकिन इसके बारे में किसी को बताना मत.” स्टीव हैरान रह गए. उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों? जवाब मिला कि अगर लोग बिना रील के फोटो खींचने लगेंगे, तो कोडक की रील कौन खरीदेगा? डिजिटल कैमरा रील की दुकान बंद करवा देगा.
मैनेजमेंट को साथ साथ ही यह भी लग रहा था कि फोटो को टीवी पर कौन देखना चाहेगा, क्योंकि लोग तो फोटो को हाथ में पकड़ना और एलबम में सजाना पसंद करते हैं. उन्होंने स्टीव के उस महान आविष्कार को एक अलमारी में बंद कर दिया और फिर से अपनी रील बेचने के काम में लग गए. हम इसे महान आविष्कार क्यों कह रहे हैं, यह इस स्टोरी के अंत में बताएंगे. डिजिटल कैमरा को नकारना कोडक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक गलती थी.
20 सालों तक वहम में जीती रही कंपनी
अगले 20 सालों तक कोडक इसी वहम में रहा कि डिजिटल फोटोग्राफी कभी रील की जगह नहीं ले पाएगी. उन्हें लगा कि डिजिटल फोटो की क्वालिटी खराब होती है और लोग कभी रील का असली अहसास नहीं छोड़ेंगे. लेकिन दुनिया बदल रही थी. जापान की कंपनियां जैसे सोनी, कैनन और निकोन चुपके-चुपके डिजिटल टेक्नोलॉजी पर काम कर रही थीं. 90 के दशक के आखिर में जब डिजिटल कैमरे बाजार में आने लगे, तब भी कोडक अपनी जिद पर अड़ा रहा. बाद में उन्होंने कुछ डिजिटल कैमरे निकाले भी, तो उनमें भी रील जैसा अहसास देने की कोशिश की. वे यह मान ही नहीं पा रहे थे कि अब रील का जमाना बीत चुका है. यह ठीक वैसा ही था जैसे कोई घोड़ागाड़ी चलाने वाला कहे कि कारें कभी नहीं चलेंगी, क्योंकि उनमें घोड़ों वाला अहसास नहीं होता.
कोडक ले लिए मौत का फरमान लाया इंटरनेट!
साल 2000 के आसपास इंटरनेट और कंप्यूटर घर-घर पहुंचने लगे, तब खेल पूरी तरह बदल गया. अब लोगों को फोटो प्रिंट कराने की जरूरत नहीं थी. वे फोटो खींचते और सीधे कंप्यूटर पर देख लेते या ईमेल कर देते. कोडक के लिए यह खतरे की घंटी नहीं, बल्कि मौत का फरमान था. उनकी रील की बिक्री गिरने लगी. लैब बंद होने लगे. जिस पीली डिबिया को देखकर लोग मुस्कुराते थे, अब उसे कोई पूछने वाला नहीं था. कोडक ने बहुत देर से अपनी गलती सुधारने की कोशिश की. उन्होंने करोड़ों डॉलर खर्च करके डिजिटल बाजार में घुसना चाहा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सोनी और कैनन जैसे ब्रांड्स ने मार्केट पर कब्जा कर लिया था. जो कंपनी कभी दुनिया की सबसे कीमती कंपनियों में गिनी जाती थी, वह अब कर्ज में डूबने लगी थी.
कोडक की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उनके पास तकनीक भी थी, पैसा भी था और नाम भी था. लेकिन उनके पास वो विजन नहीं था जो आने वाले वक्त को भांप सके. वे अपनी पुरानी कामयाबी के इतने आदी हो गए थे कि उन्हें लगा कि वक्त हमेशा उनके लिए रुका रहेगा. उन्होंने यह नहीं समझा कि लोग कोडक से प्यार इसलिए नहीं करते थे, क्योंकि वह रील बेचता था, बल्कि इसलिए करते थे क्योंकि वह उनकी यादों को संजोने में मदद करता था. जब यादें संजोने का तरीका बदला, तो कोडक ने खुद को बदलने के बजाय उस नए तरीके को ही गलत ठहरा दिया.
2012 में दिवालिया, डेढ़ लाख लोग हुए बेरोजगार
साल 2012 में एक ऐसा दिन आया, जिसने पूरी बिजनेस जगत को हिला कर रख दिया. कोडक ने खुद को दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन दिया. वह कंपनी जो एक समय 1,40,000 से ज्यादा कर्मचारियों को रोजगार देती थी और जिसका मार्केट कैप अरबों में था, अब अपने पेटेंट बेचकर गुजारा करने को मजबूर थी. उन्होंने अपने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया. न्यूयॉर्क की वो फैक्ट्रियां जहां कभी दिन-रात काम होता था, अब वहां सन्नाटा पसर गया था. यह एक साम्राज्य का अंत था.
दिलचस्प बात यह है कि जब कोडक डूब रहा था, उसी समय इंस्टाग्राम जैसी छोटी-सी कंपनी सिर्फ कुछ मुट्ठीभर लोगों के साथ करोड़ों की वैल्यूएशन पा रही थी. इंस्टाग्राम ने वही किया, जो कोडक को सालों पहले करना चाहिए था.
Kodak: अब क्या करती है कंपनी
आज कोडक पूरी तरह से खत्म तो नहीं हुआ है, लेकिन वह अब पहले वाला कोडक नहीं रहा. अब वे फार्मास्यूटिकल्स, प्रिंटिंग और कुछ खास तरह की केमिकल बनाने वाली एक छोटी कंपनी बनकर रह गए हैं. कभी-कभी वे शौकिया फोटोग्राफर्स के लिए रील भी बना देते हैं, लेकिन वह बस एक याद बनकर रह गया है.
स्टीव सैसन का क्या हुआ?
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि कोडक ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया होगा, लेकिन ऐसा नहीं था. स्टीव ने कोडक में ही काम करना जारी रखा. उन्होंने वहां 35 साल तक अपनी सेवाएं दीं और 2009 में रिटायर हुए. उन्होंने डिजिटल तकनीक पर काम करना जारी रखा और 1989 में पहला DSLR (डिजिटल सिंगल लेंस रिफ्लेक्स) कैमरा भी बनाया. हालांकि, कोडक ने उसे भी बेचने से मना कर दिया, क्योंकि वे अभी भी फिल्म के बिजनेस को बचाना चाहते थे. पहला डिजिटल कैमरा बनाने वाले स्टीव सैसन को बाद में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया, लेकिन उनका अपना घर यानी कोडक उस सम्मान का हिस्सा नहीं बन सका.
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Malkhan Singh
मलखान सिंह पिछले 17 वर्षों से ख़बरों और कॉन्टेंट की दुनिया में हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई नामी संस्थानों का नाम प्रोफाइल में जुड़ा है. लगभग 4 साल से News18Hindi के साथ काम कर रहे ...और पढ़ें
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New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
January 19, 2026, 16:20 IST
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