Geopolitics
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ईरान में इंटरनेट कब तक बंद रहेगा? प्रतिबंधों का भविष्य
BBC
January 18, 2026•4 days ago

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ईरान में दस दिनों से अधिक समय से इंटरनेट बंद है, जिससे नौ करोड़ से ज़्यादा नागरिक प्रभावित हैं। सरकार ने प्रदर्शनों को दबाने के लिए इसे बंद किया है, लेकिन नई रिपोर्टें स्थायी प्रतिबंध की ओर इशारा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय वेब एक्सेस मार्च तक उपलब्ध नहीं होगा, और ईरान चीन व रूस की तरह एक नियंत्रित डिजिटल व्यवस्था की ओर बढ़ सकता है।
ईरान में क्या हमेशा के लिए इंटरनेट बंद होगा या फिर चीन और रूस की राह अपनाएगा देश?
Author, जो टाइडी,
पदनाम, साइबर सुरक्षा संवाददाता, बीबीसी,
Author, फ़रशद बायन,
पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
एक घंटा पहले
ईरान में इंटरनेट शटडाउन के दस दिन हो गए हैं. यह देश में उन सबसे लंबे दौर में से एक है जब इंटरनेट तक लोगों की पहुंच नहीं है. इसकी वजह से नौ करोड़ से ज़्यादा नागरिक सभी इंटरनेट सेवाओं से कट गए हैं. इसके अलावा फ़ोन और टेक्स्ट मैसेजिंग में भी रुकावट आई है.
ईरानी सरकार ने 8 जनवरी को इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी थीं, ज़ाहिर तौर पर इसके पीछे का मक़सद लोगों के असंतोष को दबाना और प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई को दुनिया के अन्य देशों के सामने आने से रोकना था.
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा कि बाहर से निर्देशित हो रहे "आतंकवादी अभियानों" को रोकने के मक़सद से इंटरनेट को बंद किया गया.
सरकार ने यह नहीं बताया है कि इंटरनेट सेवाएं कब वापस आएंगी, लेकिन नई न्यूज़ रिपोर्टों से पता चलता है कि पर्दे के पीछे ईरानी अधिकारी इसे स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने की योजना बना रहे हैं.
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15 जनवरी को न्यूज़ वेबसाइट ईरानवायर ने बताया कि सरकारी प्रवक्ता फातिमा मोहजरानी ने पत्रकारों से कहा कि अंतरराष्ट्रीय वेब एक्सेस कम से कम मार्च के अंत में ईरानी नए साल तक उपलब्ध नहीं होगा.
'फ़िल्टरवॉच' के इंटरनेट की आज़ादी से जुड़े पर्यवेक्षकों का मानना है कि सरकार ईरान को अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट से काटने के लिए जल्दबाज़ी में नई व्यवस्था और नियम लागू कर रही है.
फ़िल्टरवॉच ने अनाम सरकारी सूत्रों का हवाला देते हुए कहा, "अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट एक्सेस के फिर से शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिए और इसके बाद उपयोगकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट तक पहुंच कभी भी पहले जैसी नहीं होगी."
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हालांकि बीबीसी इस रिपोर्ट या इसके लागू होने के समय की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकता है, लेकिन बीबीसी फ़ारसी से बात करने वाले पत्रकारों ने भी कहा कि उन्हें बताया गया था कि इंटरनेट एक्सेस जल्दी ही बहाल नहीं होने वाला है.
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
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ईरान ने कई साल से इंटरनेट पर कड़ी पकड़ बना रखी है, ज़्यादातर पश्चिमी सोशल मीडिया ऐप्स और प्लेटफ़ॉर्म्स यहाँ ब्लॉक हैं.
इसके साथ ही ईरान में बीबीसी न्यूज़ जैसी बाहरी न्यूज़ वेबसाइट भी ब्लॉक हैं.
हालांकि कई लोगों ने वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का इस्तेमाल कर इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय ऐप्स को एक्सेस किया है.
अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संगठन एक्सेस नाउ के इंटरनेट की आज़ादी को लेकर कैंपेन करने वालों का कहना है कि ईरान ने बड़े पैमाने पर हिंसा और प्रदर्शनकारियों पर क्रूर कार्रवाई को छिपाने के लिए लगातार इंटरनेट बंद करने का उपाय अपनाया है.
उनका कहना है कि यही नवंबर 2019 और सितंबर 2022 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान देशव्यापी इंटरनेट बंद के समय देखा गया था.
जून 2025 में ईरान-इसराइल संघर्ष के दौरान भी देश में इंटरनेट सेवाएं बंद की गई थीं. हालाँकि मौजूदा ब्लैकआउट पिछले किसी भी शटडाउन से ज़्यादा समय तक चल रहा है.
एक सार्वजनिक बयान में 'एक्सेस नाउ' संस्था ने कहा कि इंटरनेट एक्सेस को पूरी तरह से बहाल करना बहुत ज़रूरी है.
इसमें कहा गया, "इन ज़रूरी सेवाओं तक पहुंच को सीमित करने से न सिर्फ़ लोगों की जान ख़तरे में पड़ती है, बल्कि अधिकारियों को मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही छिपाने और उससे बचने का हौसला मिलता है."
पहले से ही ऐसी ख़बरें हैं कि ईरान में शटडाउन की वजह से ख़ासकर ई-कॉमर्स पर जो प्रभाव पड़ा है, उससे लोगों की रोज़ी-रोटी पर बुरा असर पड़ रहा है.
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (एचआरएएनए) का अनुमान है कि 18 जनवरी तक 3,300 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 4,380 से ज़्यादा मामलों की जाँच की जा रही है.
यह भी बताया गया है कि 187 शहरों में गिरफ़्तार लोगों की संख्या 24,266 तक पहुंच गई है.
माना जाता है कि मारे गए और हिरासत में लिए गए लोगों की असली संख्या कहीं ज़्यादा है, लेकिन पहुंच न होने से इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती.
इंटरनेट मॉनिटरिंग प्रोजेक्ट, फ़िल्टरवॉच का कहना है कि यह ताज़ा शटडाउन ज़्यादा बड़े "डिजिटल आइसोलेशन" की शुरुआत है और इससे ऑनलाइन जो कुछ भी कहा, भेजा या देखा जाता है, उस पर निगरानी बढ़ जाएगी.
फ़िल्टरवॉच चलाने वाले मियान ग्रुप में साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल राइट्स के डायरेक्टर आमिर रशीदी ने बीबीसी को बताया कि उनका मानना है कि अधिकारी एक टियर सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें ग्लोबल इंटरनेट संपर्क अब अपने आप नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए मंज़ूरी लेनी होगी.
उन्हें उम्मीद है कि इंटरनेट एक्सेस.. रजिस्ट्रेशन और वेरिफ़िकेशन प्रोसेस के ज़रिए दिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान में ऐसी व्यवस्था के लिए तकनीकी बुनियादी ढांचा सालों से मौजूद है.
इंटरनेट के बारे में फ़ैसला कौन लेता है?
फ़िल्टरवॉच के अनुसार, इन प्लान के बारे में सार्वजनिक रूप से बात नहीं की जा रही है और इससे जुड़े अहम फ़ैसले लेने के अधिकार आम सेवाओं से जुड़े मंत्रालयों के बजाय सुरक्षा एजेंसियों के हाथों में ज़्यादा केंद्रित हो रहे हैं.
ईरान को साइबर हमलों से बचाना, जिनमें से हाल के सालों में कई बड़े और नुक़सान पहुंचाने वाले मामले सामने आए हैं, इन बड़े कदमों के पीछे एक और वजह हो सकती है.
हालांकि विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि ईरान के अंदरूनी पावर डायनामिक्स और बड़े आर्थिक और तकनीकी दबावों के कारण ये योजनाएं पूरी तरह से लागू नहीं हो सकती हैं या इन्हें पूरे देश में एक समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता है.
अमीर रशीदी कहते हैं कि इंटरनेट सेवा मुहैया कराने वालों के लिए जोखिम, साथ ही यूज़र्स की वैकल्पिक प्लेटफॉर्म पर जाने या उन्हें अपनाने की क्षमता, ईरान में नई व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया को और जटिल बना सकती है.
क्या चीन और रूस की राह लेगा?
अगर ईरान रिपोर्ट की जा रही योजनाओं पर आगे बढ़ता है, तो वह रूस और चीन जैसी व्यवस्था को ही फ़ॉलो करेगा.
चीन इंटरनेट कंट्रोल करने के मामले में दुनिया में सबसे आगे है. उसने न सिर्फ़ किसी मुद्दे पर ऑनलाइन चर्चा पर व्यापक पैमाने पर सरकारी सेंसरशिप लगाई है, बल्कि इस बात पर भी उसका नियंत्रण है कि लोग दूसरे देशों की किन चीज़ों को एक्सेस कर पाते हैं.
तथाकथित ग्रेट चाइनीज़ फ़ायरवॉल नागरिकों को ज़्यादातर ग्लोबल इंटरनेट से ब्लॉक कर देता है और फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, और यूट्यूब जैसे पश्चिमी देशों के सभी ऐप्स वीपीएन के बिना एक्सेस नहीं किए जा सकते. हालाँकि उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल होता जा रहा है.
साल 2019 में, रूस ने रू-नेट (Ru-net) नाम का एक ऐसा ही सिस्टम बनाने के लिए एक बड़ी योजना का परीक्षण शुरू किया.
लेकिन चीन के विपरीत, जिसने दशकों पहले इसके विस्तार के साथ ही इंटरनेट पर सरकारी कंट्रोल बनाया था, रूस को एक जटिल सिस्टम में सरकारी कंट्रोल को नए सिरे से फिट करना पड़ रहा है.
रूस चीन से एक कदम आगे जा रहा है और एक 'किल स्विच' के साथ ख़ुद को वर्ल्ड वाइड वेब से अलग करने की योजना बना रहा है, जिसका इस्तेमाल ज़ाहिर तौर पर संकट के समय किया जाएगा.
यह सिस्टम देश के अंदर इंटरनेट ट्रैफिक की अनुमति देगा और देश को ऑनलाइन चालू रखेगा, लेकिन ट्रैफिक देश से बाहर या बाहर से देश के अंदर नहीं आएगा.
यह असल में एक डिजिटल बॉर्डर होगा, लेकिन इसका अभी पूरी तरह से परीक्षण होना बाक़ी है.
अगर ईरान से आ रही रिपोर्ट्स सही हैं, तो ऐसा लगता है कि वह स्थायी तौर पर चीन और रूस की तरह इंटरनेट पर नियंत्रण के लगभग मिले-जुले सिस्टम की योजना बना रहा है.
ब्रिटेन की सरे यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर सिक्योरिटी एक्सपर्ट प्रोफेसर एलन वुडवर्ड ने ईरान की योजनाओं की रिपोर्ट्स देखने के बाद कहा, "ईरान में ऐसा लगता है कि देश में सभी को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक एक्सेस से अलग करने की कोशिश की जा रही है, जब तक कि उन्हें सरकार की मंज़ूरी नहीं मिलती है."
उनका मानना है कि ईरानी सरकार शायद अपनी दीर्घकालिक योजनाओं पर आगे बढ़ गई है और मौजूदा ब्लैकआउट को एक वजह बनाकर अभी टेक्निकल बदलाव और आदेश दे रही है.
अमीर रशीदी कहते हैं कि अब सवाल टेक्निकल नहीं, बल्कि राजनीतिक है.
उनका तर्क है कि ऐसे सिस्टम का पूरी तरह से लागू होना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है.
'यह हमेशा चूहे-बिल्ली का खेल रहेगा'
स्टारलिंक और दूसरी इंटरनेट-फ्रॉम-स्पेस सर्विस, जिन्हें लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) के नाम से जाना जाता है, उन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान ईरान के लिए नियंत्रण को मुश्किल कर दिया है.
ईरानी सरकार कुछ स्टारलिंक यूज़र्स को जाम करने और उनमें दख़ल देने में कामयाब रही. लेकिन कंपनी ने बीबीसी को यह कन्फ़र्म किया है कि उसकी तरफ़ से सरकारी ब्लॉकिंग की कोशिशों को बायपास करने के लिए अपने फ़र्मवेयर को अपडेट किया गया और इसके दूसरे टर्मिनल चालू हैं.
वह एलईओ में हुई तरक्की और इस बात का ज़िक्र करते हैं कि अब कई फ़ोन और इंटरनेट बंद होने पर भी एसओएस (आपातकालीन संदेश) मैसेज जैसी चीज़ों के लिए सैटेलाइट का इस्तेमाल कर सकते हैं.
कुछ नए ऐप भी आ रहे हैं जो ब्लूटूथ पर निर्भर मेश नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जो ऐसी जगहों पर कनेक्टिविटी ला सकते हैं जहां इसकी सुविधा नहीं है.
वुडवर्ड कहते हैं, "यह लगभग तय है कि इंटरनेट एक्सेस आख़िरकार सच में यूनिवर्सल हो जाएगा, लेकिन दमनकारी सरकारों के लिए यह हमेशा चूहे-बिल्ली का खेल रहेगा."
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