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ग्वालियर में महिला पेंटिंग से बदसलूकी: जब कला भी सुरक्षित नहीं, तो असल ज़िंदगी का क्या?

BBC
January 18, 20264 days ago
'जब महिलाएं पेंटिंग में सुरक्षित नहीं हैं तो असल ज़िंदगी में कैसे होंगी', ग्वालियर में दीवार पर महिलाओं के चित्र से बदसलूकी

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ग्वालियर में एक दीवार पर बनी महिलाओं की पेंटिंग के साथ छेड़छाड़ का मामला सामने आया है। पेंटिंग में महिलाओं के निजी अंगों को कुरेदा गया था। एक युवती, आशी कुशवाहा, ने इस घटना का वीडियो पोस्ट कर महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाया। एक छात्र, लोकेंद्र सिंह, ने पेंटिंग को ठीक किया। इस घटना ने सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और समाज की मानसिकता पर बहस छेड़ दी है। नगर निगम ने दीवारों पर सफेदी पुताई करवाकर नई पेंटिंग बनवाईं।

'जब महिलाएं पेंटिंग में सुरक्षित नहीं हैं तो असल ज़िंदगी में कैसे होंगी', ग्वालियर में चित्रों से बदसलूकी का मामला Author, विष्णुकांत तिवारी पदनाम, बीबीसी संवाददाता 47 मिनट पहले "मैं अभी स्कूल में हूं दो साल बाद कॉलेज जाऊंगी. आप लोगों ने मेरे लिए कैसा समाज बनाया है? महिलाएं तो पेंटिंग में भी सुरक्षित नहीं हैं तो असल ज़िंदगी में कैसे सुरक्षित होंगी. क्या मैं सुरक्षित हूं इस समाज में?" हमारा सामना इसी सवाल से हुआ जब हम मिले मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में रहने वाली 17 साल की आशी कुशवाहा से. आशी ने 1 जनवरी 2026 की सुबह ग्वालियर के नदी गेट के पास बनी दीवार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था. इस दीवार पर महिलाओं के योग करते हुए चित्र बने थे. इन चित्रों में महिलाओं के निजी अंगों पर कुरेद कर चित्रों को ख़राब कर दिया गया था. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें आशी कहती हैं कि वीडियो पोस्ट करने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि, यह सिर्फ़ चित्रों को ख़राब करने का मामला नहीं है बल्कि दुनिया की हर महिला के साथ किया गया एक भद्दा मज़ाक है. उन्होंने कहा, "ये केवल ग्वालियर की बात नहीं है. ये पूरे देश और पूरी दुनिया की बात है. महिलाओं के साथ यौन हिंसा हो रही है और हर बार लड़कियों पर ही आरोप लगाए जाते हैं कि उनकी ही ग़लती होगी. मैं ये पूछना चाहती हूं कि अगर आप किसी लड़की पर ऐसा आरोप लगाते हैं कि लड़की की ही ग़लती है तो यहां तो पेंटिंग्स बनी हुई थीं. इनकी क्या ग़लती थी?" आशी ने अपनी पोस्ट में कहा था, "यह कोई मामूली नुक़सान नहीं है. यह एक घटिया सोच, गंदी मानसिकता और महिलाओं के प्रति बेइज्ज़ती है." छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें सबसे अधिक पढ़ी गईं समाप्त क्या है पूरा मामला ? छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें कहानी ज़िंदगी की मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. एपिसोड समाप्त दरअसल 1 जनवरी की सुबह आशी अपनी दोस्त के साथ ग्वालियर के नदी गेट से होते हुए जय विलास पैलेस की ओर मॉर्निंग वॉक कर रही थीं. इसी दौरान उन्होंने महिलाओं के चित्रों के साथ की गई छेड़छाड़ पर ग़ौर किया. आशी कहती हैं, "यह देखना न सिर्फ़ हमारे लिए अनकंफ़र्टेबल था, बल्कि मन में ये सवाल भी आया कि आख़िर महिलाओं के साथ ही क्यों? मैंने फिर एक-एक कर सभी तस्वीरों को देखा. महिलाओं की हर पेंटिंग में उनके प्राइवेट पार्ट्स को स्क्रैच किया गया था और उसे हाईलाइट करने की कोशिश की गई थी. मुझे ये देखकर बहुत ही घृणा और निराशा हुई." आशी ने इस दीवार की एक वीडियो बनाई और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया. अगली सुबह ग्वालियर के ही रहने वाले लोकेंद्र सिंह जो कि अभी ग्रैजुएशन फ़र्स्ट ईयर के छात्र हैं, उन्होंने इस वीडियो को देखा. लोकेंद्र पढ़ाई के साथ सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर भी हैं और ग्वालियर शहर को अपने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं. लोकेंद्र को ग्वालियर में ज़्यादातर लोग 'केतु' के नाम से जानते हैं. लोकेंद्र ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "आशी का वीडियो जब मैंने देखा तो उसमें उन्होंने एक सवाल किया था कि आख़िर ऐसा क्यों? मेरे पास इसका जवाब तो नहीं था लेकिन मैंने सोचा कि कम से कम इसे ठीक किया जाए. तो मैंने एक पेंट का डिब्बा ख़रीदा और जहां जहां महिलाओं के चित्रों में प्राइवेट पार्ट्स को कुरेदा गया था वहां ब्लैक पेंट से उसे ढक दिया." लोकेंद्र के इस क़दम को सोशल मीडिया पर बहुत सराहा गया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों में सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है. आशी और लोकेंद्र दोनों के वीडियो वायरल होने के बाद ग्वालियर नगर निगम ने इस दीवार और इस इलाके़ की अन्य दीवारों पर सफ़ेद रंग से पुताई करवाई और 11 जनवरी को कुछ जगहों पर शहर के ही युवाओं के साथ मिलकर नई पेंटिंग बनवाई. ग्वालियर नगर निगम कमिश्नर संघ प्रिय ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "जैसे ही हमारे संज्ञान में यह मामला आया था, हमें भी बहुत ख़राब लगा और नगर निगम ने शहर के युवाओं के साथ मिलकर इसको ठीक करने की योजना बनायी. सबसे पहले नगर निगम ने दीवारों पर सफे़द रंग पुतवाया और फिर युवाओं के साथ मिलकर उस दीवार पर नई पेंटिंग्स बनायी". 'कुछ भी ठीक करने के लिए हिम्मत चाहिए' लोकेंद्र बताते हैं कि उन्होंने जब ये वीडियो पहली बार देखा तो उन्हें बहुत बुरा लगा था. और जिस दिन लोकेंद्र उसे ठीक करने पहुंचे, उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "प्रेशर तो नहीं लग रहा था लेकिन पहली बार ऐसे खड़ा था पब्लिक में, बहुत गंदा लग रहा था. लोग देख रहे थे. दिमाग़ में कई बातें आ रही थीं कि, लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे लेकिन मैंने इन सब पर ध्यान नहीं दिया." वह कहते हैं कि उन्होंने इस घटना के बाद जब इंटरनेट पर इसके बारे में और जानकारी खोजी तो उनके होश उड़ गए. लोकेंद्र कहते हैं, "यह ग्वालियर तक सीमित नहीं है, देखा जाए तो हमारे देश और विदेशों में भी है क्योंकि मैंने अभी हाल ही में वीडियो देखा जो किसी अन्य देश का था उसमें एक जगह महिलाओं की कुछ मूर्तियां थीं. उन मूर्तियों में महिलाओं के प्राइवेट पार्ट को लोगों ने इतनी बार टच किया कि उसका कलर चेंज हो गया तो यह कहीं ना कहीं लोगों की मानसिकता को दर्शाता है." आशी और लोकेंद्र दोनों का कहना है कि नगर निगम द्वारा उठाए गए क़दम एक बड़ी समस्या के समाधान का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा हैं. सिर्फ़ पेंटिंग ठीक करना उपाय नहीं, महिलाओं को लेकर समाज की मानसिकता बदलने की ज़रूरत है. आशी कहती हैं, "जब मैं ये वीडियो शूट कर रही थी तब बहुत लोग वहां से गुज़र रहे थे. कुछ लोग कमेंट करके जा रहे थे तो कुछ लड़के हंस रहे थे. लेकिन मैंने उन पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि मुझे तो अपना काम करना था और मेरी यही सोच थी कि शायद इस वीडियो से कुछ अच्छा हो जाए." काले रंग से बने इन चित्रों में न तो किसी महिला का चेहरा दिख रहा है, न ही किसी की स्किन लेकिन फिर भी उन्हें ऑब्जेक्टिफाई किया गया. आशी कहतीं हैं, "ये एक घटना की बात नहीं है… बल्कि पूरी दुनिया की बात है… इस मानसिकता की बात है और हमें अब लोगों की, समाज की सोच पर सवाल करना चाहिए." उन्होंने आगे कहा, "इन चित्रों को विरूपित भी तो समाज के ही लोगों ने किया है? और जो महिलाओं के साथ अपराध होते हैं वो भी तो समाज के लोग ही करते हैं. इसलिए पेंटिंग में की गई हरकत और असल दुनिया में महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार एक ही है." लोकेंद्र आशी की बात से सहमत होते हुए कहते हैं, "पेंट कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा. यह तो ऐसा हुआ कि किसी चीज़ को ढक दिया जाए." आशी सवाल करती हैं, "नगर निगम ने जो किया वह सराहनीय है. लेकिन ये सॉल्यूशन का सिर्फ़ एक हिस्सा है. हम दीवारों पर तो सफ़ेद रंग चढ़ा देंगे लेकिन जो लोगों की मानसिकता है, जिन्होंने ये किया होगा क्या उनकी सोच पेंटिंग बदल देने से ठीक हो जाएगी?" विदेश में भी ऐसे मामले सामने आए आशी कहती हैं कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के चित्र या पेंटिंग एक आसान टार्गेट होते हैं. आशी ने कहा, "लोग महिलाओं को कमज़ोर समझते हैं. और ये पेंटिंग्स तो कई सालों से ऐसी ही हैं. जब तक मैंने इस पर बात नहीं की तब तक किसी ने बात नहीं की क्योंकि लोगों के लिए यह एक सामान्य बात है. जो कि बहुत बुरा है." महिलाओं के शरीर या उनके प्राइवेट पार्ट्स को दर्शाने वाली सार्वजनिक कलाकृतियाँ और उनके साथ छेड़छाड़ का यह मामला नया नहीं है. साल 2024 में जर्मनी की महिला अधिकार संस्था टेरे दे फ़ेम्स ने एक अभियान के ज़रिए यह दिखाया था कि दुनिया के अलग अलग शहरों में लगी महिलाओं की कांस्य मूर्तियों के स्तन लगातार छुए जाने की वजह से शरीर के अन्य हिस्सों की तुलना में ज़्यादा बदरंग हो गए हैं. संस्था का कहना था कि यह इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के शरीर को लेकर यौन हिंसा को सामान्य मान लिया गया है. इसी तरह आयरलैंड की राजधानी डबलिन में लगी प्रतिमा को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. आयरलैंड में डबलिन शहर के केंद्र में स्थित मॉली मेलोन नामक महिला की प्रतिमा के स्तन बार-बार छुए जाने की वजह से बाकी कांस्य हिस्सों की तुलना में ज़्यादा चमकदार हो गए हैं. इस घटना के बाद लोगों द्वारा मॉली मेलोन की प्रतिमा को छूने से रोकने के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे. आशी और लोकेंद्र दोनों ही कहते हैं कि यह सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के शरीर के साथ होने वाले असहज व्यवहार का उदाहरण है. इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से यह साफ़ होता है कि सार्वजनिक कला में महिलाओं के शरीर के साथ किया जाने वाला व्यवहार किसी एक देश तक सीमित नहीं है. चाहे वह दीवार पर बनी पेंटिंग हो या शहर के बीच खड़ी मूर्ति, महिलाओं की प्रतीकात्मक मौजूदगी भी अक्सर उसी असुरक्षा से घिरी रहती है, जिसकी बात आशी ग्वालियर में करती हैं. कैसा होना चाहिए महिलाओं के लिए सेफ़ पब्लिक स्पेस? इस सवाल के जवाब में आशी और लोकेंद्र दोनों का ही कहना था कि समाज और ख़ासकर पुरुषों को अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है. वो कहती हैं, "ऐसी जगह, ऐसा समाज जहां मैं खुलकर हंस सकूं, किसी से दो बात करूं तो उसे ये न लगे कि मैं उसे कोई इशारा कर रही हूं, या वो अब मेरे साथ कुछ भी कर सकता है, यहां तक कि यौन हिंसा भी. मेरे पहनावे या बोल-चाल से मुझे जज न किया जाए. "पेंटिंग पर वाइटवॉश करना छोटी चीज़ है… सोच में बदलाव लाना बड़ी चीज़ और यह इसलिए करना होगा ताकि मेरे जैसी लड़कियां, दुनिया की हर महिला अपने आस-पास पुरुषों से सुरक्षित महसूस कर सकें और उन्हें डर न लगे," आशी ने यह कहते हुए हमसे बातचीत ख़त्म की.

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