Thursday, January 22, 2026
Geopolitics
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क्या ग्रीनलैंड का भी होगा तिब्बत जैसा हश्र?

News18 Hindi
January 20, 20262 days ago
क्या शांति ही युद्ध को न्योता देती है? जैसे तिब्बत ने खोई आजादी, क्या ग्रीनलैंड का भी होने वाला है वही हश्र

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ग्रीनलैंड आज तिब्बत जैसी दुविधा में है, जहाँ एक ओर अमेरिका उसे ख़रीदना चाहता है, वहीं चीन और रूस की भी इस पर नज़र है। तिब्बत ने आध्यात्मिक अनुशासन को प्राथमिकता दी, जिससे उसकी सैन्य क्षमता कमज़ोर रही और वह चीन के सामने अपनी संप्रभुता खो बैठा। इसी तरह, ग्रीनलैंड भी अमेरिका के बढ़ते दबाव, आर्कटिक रणनीति और संसाधनों की राजनीति में फंसकर 'बेचे जाने' या 'हासिल किए जाने' के खतरे का सामना कर रहा है।

क्या शांति ही युद्ध को न्योता देती है? जैसे तिब्बत ने खोई आजादी, क्या ग्रीनलैंड का भी होने वाला है वही हश्र Edited by : Deepak Verma Agency:फर्स्टपोस्ट.कॉम Last Updated:January 20, 2026, 20:02 IST Trump Greenland News: ग्रीनलैंड आज उसी दुविधा में है, जहां तिब्बत दशकों पहले था. ट्रंप इसे खरीदना चाहते हैं और चीन-रूस की भी इस पर नजर है. तिब्बत ने आध्यात्मिक अनुशासन को प्राथमिकता दी, लेकिन सैन्य डिटरेंस कमजोर रहा और 1950-59 में चीन के सामने उसकी संप्रभुता टूट गई. अब ग्रीनलैंड भी अमेरिका के बढ़ते दबाव, आर्कटिक रणनीति और संसाधनों की राजनीति में फंसकर ‘बेचे जाने’ या ‘हासिल किए जाने’ के खतरे से जूझ रहा है. नई दिल्ली: दुनिया की राजनीति में एक सवाल बार-बार लौटता है: क्या शांति से जीने की चाह, ताकतवरों को हमला करने की छूट दे देती है? इतिहास बताता है कि हर सभ्यता को युद्ध प्रिय नहीं होता. कुछ समाज अपनी पहचान तलवार से बनाते हैं, और कुछ अपने भीतर की अनुशासन-शक्ति से. पर जब बाहरी दुनिया क्रूर हो, तब शांत रहना एक नैतिक चुनाव नहीं रहता, बल्कि कई बार एक रणनीतिक भूल बन जाता है. तिब्बत इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है. यह ऐसी सभ्यता थी जिसने सदियों तक खुद को आध्यात्मिक अनुशासन, करुणा और आत्म-संयम के जरिए महान बनाने की कोशिश की. उसने सैन्य विस्तार को हीन माना. पर समस्या यह नहीं थी कि तिब्बत शांतिप्रिय था. समस्या यह थी कि तिब्बत ने यह मान लिया कि शांति उसे सुरक्षित रखेगी. अब यही डर ग्रीनलैंड के बारे में उभर रहा है. दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, जिसकी आबादी महज 57 हजार के आसपास है, आज सुपरपावरों की नजरों में ‘रणनीतिक ट्रॉफी’ बनता जा रहा है. ग्रीनलैंड की मंत्री नाजा नाथानिएलसेन ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखते हुए बेहद मार्मिक बात कही कि ग्रीनलैंड में रहना सौभाग्य है, पर हमारे पास एक चीज नहीं है, तादाद की ताकत. उनका कहना है कि 57 हजार लोग अमेरिका के एक स्टेडियम में समा सकते हैं और फिर भी सीटें खाली रह जाएंगी. इसी वजह से कुछ अमेरिकियों को यह स्वीकार करना कठिन लगता है कि इतनी कम आबादी वाला समाज इतनी विशाल जमीन पर अधिकार कैसे रख सकता है. और यही सोच सबसे खतरनाक होती है, जब बड़े देश छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता को ‘तर्क’ के जरिए चुनौती देने लगें. ग्रीनलैंड की शांति पर संकट क्यों बढ़ रहा है? ग्रीनलैंड अब उस दोराहे पर खड़ा है, जहां उसके सामने विकल्प बेहद कठोर हैं: या तो उसे ‘बेचा’ जाएगा या फिर उसे ‘हासिल’ किया जाएगा अंतर सिर्फ तरीका है, नतीजा नहीं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर फिर से आक्रामक रुख अपनाया है और कहा है कि अमेरिका अपने उद्देश्य से ‘पीछे नहीं हटेगा’ और जरूरत पड़ी तो ताकत का इस्तेमाल भी हो सकता है. इस मुद्दे ने यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में तनाव बढ़ा दिया है और नाटो जैसी व्यवस्था पर भी दबाव बनाया है. यूरोप इस दबाव को ब्लैकमेलिंग मान रहा है. गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ‘ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण’ की बात कर रहे हैं और कुछ देशों पर टैरिफ धमकियों तक की चर्चा सामने आई है. डेनमार्क ने साफ कह दिया है कि ग्रीनलैंड को किसी पूंजी-शक्ति या सैन्य दबाव के जरिए ‘अधिग्रहण’ नहीं किया जा सकता. लेकिन इस बीच एक और सच्चाई भी है: ग्रीनलैंड का अकेलापन. वह भले स्वायत्त हो, पर वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र राष्ट्र नहीं. उसकी सुरक्षा, विदेश नीति और कई रणनीतिक फैसलों में डेनमार्क की भूमिका है. इसी वजह से यह द्वीप अक्सर बड़ी शक्तियों की ‘डील-मेकिंग’ में कमजोर कड़ी बन जाता है. ग्रीनलैंड की जंग: जब रणनीति, संसाधन और भूगोल मिलकर लालच बन जाएं ग्रीनलैंड का महत्व सिर्फ जमीन नहीं है. यह आज के दौर की तीन बड़ी लड़ाइयों का केंद्र है: आर्कटिक कंट्रोल आर्कटिक में बढ़ती गतिविधि, समुद्री रास्ते और सैन्य तैनाती. मिनरल्स और एनर्जी दुर्लभ खनिज, ऊर्जा और भविष्य की टेक्नोलॉजी से जुड़े संसाधन. भू-रणनीतिक लोकेशन रूस, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच ग्रीनलैंड एक तरह से ‘फॉरवर्ड बेस’ बन सकता है. यानी ग्रीनलैंड का ‘शांत रहना’ अब उसे शांति नहीं दिला रहा. बल्कि शांति ने उसे चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना दिया है. क्या तिब्बत की तरह ग्रीनलैंड भी ‘शांति की कीमत’ चुकाएगा? यह तुलना पूरी तरह समान नहीं है, पर संकेत डराने वाले हैं. तिब्बत ने भी खुद को ‘शांति के आदर्श’ के रूप में देखा. तिब्बत का शासन-तंत्र आधुनिक लोकतंत्र नहीं था, पर उसका राजनीतिक-सामाजिक चरित्र असामान्य था: एक ऐसी व्यवस्था जहां आध्यात्मिक वैधता और राजनीतिक सत्ता साथ-साथ चलती थी. तिब्बत की ‘ग्रेटनेस’ युद्ध से नहीं बनी थी. वह बनी थी: मठों के अनुशासन से करुणा को नीति मानने से आत्मिक उन्नति को राष्ट्र उद्देश्य मानने से यही उसकी पहचान थी. और यही उसकी कमजोरी भी. तिब्बत ने बाहरी ताकत को हल्के में क्यों लिया? यह कहना गलत होगा कि तिब्बत हिंसा से अनजान था. हर समाज की तरह उसके पास भी संघर्ष, साजिश और सत्ता-टकराव थे. लेकिन तिब्बती राजनीतिक संस्कृति में सैन्यवाद धीरे-धीरे ‘निम्न स्तर’ की चीज समझा जाने लगा. जब कोई समाज अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा भीतर की शक्ति बनाने में लगा दे, तो सीमा सुरक्षा, सैन्य लॉजिस्टिक्स और डिटरेंस की तरफ ध्यान कम हो जाता है. यही हुआ. और फिर इतिहास में वह क्षण आता है, जब बाहर की दुनिया कहती है: करुणा अच्छी है, पर तुम कमजोर हो. 1950: जब युद्ध ने एक ऐसे समाज को घेरा जो युद्ध के लिए बना ही नहीं था 1950 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पूर्वी तिब्बत में प्रवेश किया. यह एक बराबरी की लड़ाई नहीं थी. तिब्बत आधुनिक युद्ध मशीन के सामने टिक नहीं सका. 1951 में तिब्बती प्रतिनिधियों ने बीजिंग में ‘सेवेंटीन पॉइंट एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए, जिसे चीन ‘पीसफुल लिबरेशन’ कहता है. लेकिन कई इतिहासकारों और संस्थानों के अनुसार यह समझौता दबाव और सैन्य मजबूरी में कराया गया था. ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के ‘ओरिजिन्स’ प्रोजेक्ट में इसे ‘साइन अंडर ड्यूरैस’ बताया गया है. विकिपीडिया समेत कई स्रोतों में भी यह उल्लेख है कि तिब्बती प्रतिनिधियों को ल्हासा की पूर्ण स्वीकृति नहीं थी और हस्ताक्षर दबाव में हुए. यहां सच्चाई बेहद सादी है कि जब एक राष्ट्र आधुनिक सैन्य ताकत के सामने खड़ा हो और उसके पास डिटरेंस न हो, तो उसके नैतिक मूल्य उसे ढाल नहीं दे सकते. 1959: टूटने का साल और अंतहीन निर्वासन 1959 में ल्हासा में विद्रोह भड़का. हजारों लोग दलाई लामा के महल के आसपास इकट्ठा हुए. डर यह था कि उन्हें अगवा या मजबूर किया जाएगा. संघर्ष बढ़ा और अंततः दलाई लामा भारत चले आए. निर्वासन सिर्फ व्यक्ति का नहीं था, एक सभ्यता के राजनीतिक भविष्य का था. तिब्बत की हार केवल जमीन का नुकसान नहीं थी. वह एक पूरे मनोवैज्ञानिक संसार का ढह जाना था. एक दिन के बाद से तिब्बती समाज अपनी कहानी का लेखक नहीं रहा, वह अपनी कहानी का श्रोता बन गया. तिब्बत ने क्या खोया? सिर्फ सीमा नहीं, आत्मविश्वास भी तिब्बत ने खोया: अपनी संप्रभुता पर भरोसा अपनी संस्थाओं का अधिकार संस्कृति का सहज प्रवाह (भाषा, रीति, परंपरा) भविष्य की गारंटी और सबसे बड़ी बात: वह भावना कि कल भी ‘तिब्बती’ होगा जैसे कल तक था. विडंबना यह है कि तिब्बत ने हिंसा से बचने की कोशिश की और वही हिंसा उसके ऊपर स्थायी शासन बनकर बैठ गई. ग्रीनलैंड को तिब्बत से क्या सीखना चाहिए? तिब्बत की कहानी यह नहीं कहती कि शांति बेकार है. यह कहती है कि शांति अधूरी है अगर वह गार्डेड नहीं है. ग्रीनलैंड के लिए सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि वहां हमला हो जाएगा. सबसे बड़ा खतरा यह है कि बड़े देश उसके बारे में यह मान लें कि: वह खुद निर्णय लेने में सक्षम नहीं वह इतनी बड़ी भूमि का ‘हकदार’ नहीं वह किसी सुरक्षा गारंटी के बदले ‘ट्रांसफर’ किया जा सकता है यानी एक समय के बाद मुद्दा जमीन नहीं रहता. मुद्दा बन जाता है वैधता. ग्रीनलैंड का तिब्बत बनना जरूरी नहीं, क्योंकि उसके पीछे डेनमार्क और यूरोप की ताकत है. पर यह तभी सच रहेगा जब यूरोप एकजुट रहे. अगर ट्रांसअटलांटिक रिश्तों में दरार बढ़ती है, और अमेरिका-यूरोप की सौदेबाजी में ग्रीनलैंड ‘मोलभाव’ बनता है, तो खतरा कई गुना बढ़ जाएगा. क्या शांति युद्ध को बुलाती है? असली जवाब यही है शांति अपने आप में कमजोरी नहीं. कमजोरी तब बनती है जब शांति को ‘रणनीति’ के विकल्प की तरह देखा जाए. दुनिया का नियम बहुत कठोर है: शांति का सम्मान वही करता है जो ताकत की भाषा समझता हो. और ताकत की भाषा वही समझता है जो ‘कीमत’ जानता हो तिब्बत ने शांति को सिद्धांत बनाया, पर डिटरेंस नहीं बनाया. ग्रीनलैंड आज उसी परीक्षा में है. अगर उसने अपनी राजनीतिक-रणनीतिक स्थिति को ‘नैतिक अपील’ पर छोड़ दिया, तो वह उसी तरह असहाय हो सकता है जैसे तिब्बत हुआ था. About the Author Deepak Verma दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्‍य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़...और पढ़ें Click here to add News18 as your preferred news source on Google. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। Location : New Delhi,Delhi First Published : January 20, 2026, 19:53 IST homeknowledge तिब्बत ने जिस तरह खोई अपनी आजादी, क्या ग्रीनलैंड का भी होने वाला है वही हश्र? और पढ़ें

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