Geopolitics
12 min read
जर्मनी बना रहा यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेना: भारत के अग्निवीर मॉडल से प्रेरणा
Navbharat Times
January 19, 2026•3 days ago
AI-Generated SummaryAuto-generated
जर्मनी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनी सेना का पुनर्गठन कर रहा है, जिसका लक्ष्य यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेना बनना है। 23 महीने के स्वैच्छिक अनुबंध पर सैनिकों की भर्ती की जा रही है, जो भारत के 'अग्निवीर' मॉडल से प्रेरित है। यह विस्तार रूस के लिए चिंता का विषय है, जबकि जर्मन जनता का अमेरिका से भरोसा उठने के कारण रक्षा बजट में भारी वृद्धि हुई है।
बर्लिन: जर्मनी, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक बार फिर से यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेना बनाने लगा है। जर्मनी में अब 18 साल की उम्र से ज्यादा के हर एक युवक को जर्मनी के नये कानून के मुताबिक आर्मी में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि ये वॉलंटरी है, लेकिन यह कानून सरकार को वर्ल्ड वॉर II के बाद पहली बार यूरोप की सबसे मजबूत आर्मी बनाने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए अनिवार्य सर्विस शुरू करने की इजाजत देता है। पिछले साल जर्मनी के पास एक्टिव ड्यूटी पर तैनात सैनिकों की संख्या 184,000 थी, जो मई के मुकाबले 2500 ज्यादा है। उस दौरान जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने पहली बार संसद में कहा था कि सेना, या बुंडेसवेहर, "को यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनने की जरूरत है"।
पॉट्सडैम में बुंडेसवेहर सेंटर ऑफ मिलिट्री हिस्ट्री एंड सोशल साइंसेज के एक सीनियर रिसर्चर टिमो ग्राफ ने अलजजीरा की एक रिपोर्ट में कहा है कि "यह बहुत लंबे समय में उनकी सबसे बड़ी सैनिकों की संख्या है और यह 2021 के बाद से हमारी सबसे मजबूत सेना है।" जर्मनी की सरकार ने 23 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर वॉलंटियर सर्विस शुरू की है और इसके लिए अच्छी सैलरी और सुविधाओं का लालच दिया गया है। हालांकि इस कॉन्ट्रैक्ट को बाद में अनिश्चित काल के लिए प्रोफेशनल सर्विस में बढ़ाया जा सकता है। ये स्कीम काफी हद तक भारत के अग्निवीर सैनिकों से मिलता है, लेकिन भारत में ऐसा 4 सालों के लिए है।
जर्मनी में 'अग्निवीरों' को कितनी सैलरी?
रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी में ऐसे सैनिकों को 2600 यूरो यानि करीब 3000 डॉलर दिए जाएंगे, क्योंकि वहां रहने की जगह पहले से ही मुफ्त है। मेडिकल इंश्योरेंस फ्री है और टैक्स काटने के बाद उनके पास करीब 2700 डॉलर प्रति महीने बनेंगे। 18 साल के युवाओं के लिए ये बहुत ज्यादा पैसा है। जर्मनी ने NATO से वादा किया है कि वह 2035 तक एक्टिव ड्यूटी पर सैनिकों की संख्या को बढ़ाकर 260,000 तक ले जाएगा। इसके अलावा वो रिजर्व सैनिकों की संख्या को भी दोगुनी करके 200,000 करेगा। यानि, शीत युद्ध के समय जर्मनी के पास जितने सैनिक थे, वो उस स्तर तक पहुंच जाएगा। जर्मनी की इन कोशिशों से मॉस्को परेशान हो गया है। जर्मनी में रूस के राजदूत सर्गेई नेचायेव ने पिछले महीने जर्मन न्यूज पोर्टल अपोलुट को एक इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने बताया था कि "जर्मनी की नई सरकार रूस के साथ बड़े पैमाने पर मिलिट्री टकराव की तैयारी तेज कर रही है।" हालांकि, जर्मनी के लिहाज से देखा जाए तो यूक्रेन से जब रूस ने पीछे हटने से इनकार कर दिया, उसके बाद जर्मनी ने अपनी सेना के लिए 125 अरब डॉलर खर्च करने का प्रस्ताव बनाया। जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2.5 प्रतिशत है। जबकि साल 2021 में जर्मनी का डिफेंस बजट सिर्फ 56 अरब डॉलर ही था। इतना ही नहीं 2030 तक, जर्मनी अपनी GDP का 3.5 प्रतिशत हिस्सा डिफेंस पर खर्च करेगा।
अमेरिका से टूट गया है जर्मनों का भरोसा
रूसी खतरे के बीच जर्मनी के लोगों का अमेरिका से भरोसा टूट चुका है। पिछले एक साल में जर्मन समाज का अमेरिका पर से भरोसा उठना इस डिफेंस बजट में आए एतिहासिक उछाल की सबसे बड़ी वजह है। जून 2025 में सरकारी चैनल ZDF ने जर्मनी में एक सर्वे करवाया था। इस पोल में जर्मनों से पूछा गया था कि "क्या USA NATO के हिस्से के तौर पर यूरोप की सुरक्षा की गारंटी देना जारी रखेगा?" इसमें 73% लोगों ने नहीं कहा। दिसंबर में ये आंकड़ा बढ़कर 84 प्रतिशत हो गया था। अब 10 में से नौ जर्मन, यूरोप में अमेरिकी राजनीतिक प्रभाव को नुकसानदायक मानते हैं। जाहिर तौर पर डोनाल्ड ट्रंप इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हैं।
लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअभिजात शेखर आजाद, नवभारत टाइम्स में इंटरनेशनल अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं। जियो-पॉलिटिक्स और डिफेंस पर लिखते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में 16 सालों का अनुभव है। अपने कैरियर की शुरूआती दिनों में उन्होंने क्राइम बीट में काम किया और ग्राउंड रिपोर्टिंग की। उन्होंने दो लोकसभा चुनाव को कवर किया है। इसके बाद वो इंटरनेशनल अफेयर्स की तरफ आ गये, जहां उन्होंने अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव के साथ साथ कई देशों के इलेक्शन और वहां की राजनीति को कवर किया है। डिफेंस सेक्टर, हथियारों की खरीद बिक्री और अलग अलग देशों के बीच होने वाले संघर्ष पर लगातार लिखते रहते हैं। वो ज़ी मीडिया समेत कई प्रतिष्ठित संस्थान में काम कर चुके हैं। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन पर वो डिफेंस और जियो-पॉलिटिक्स के एक्सपर्ट्स, डिप्लोमेट्स और सैन्य अधिकारियों से बात करते रहते हैं। इस समय वो 'बॉर्डर-डिफेंस' नाम से साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू भी करते हैं, जो डिफेंस पर आधारित है। उन्होंने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय से इंग्लिश जर्नलिज्म की पढ़ाई है।... और पढ़ें
Rate this article
Login to rate this article
Comments
Please login to comment
No comments yet. Be the first to comment!
