Thursday, January 22, 2026
Health & Fitness
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सेहत के लिए क्लीन ईटिंग और शुगर-फ्री डाइट: एक्सपर्ट से जानें क्या है सही

DNA India
January 19, 20263 days ago
सेहत के लिए Clean Eating के क्या हैं मायने, Sugar Free डाइट कितना सही? एक्सपर्ट से जानें

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सेहत के लिए क्लीन ईटिंग का मतलब पौष्टिक और संतुलित आहार है, न कि महंगे उत्पाद। इसमें प्रोटीन, फाइबर, सब्जियां, फल शामिल करें और प्रोसेस्ड व तले हुए भोजन से बचें। चीनी कम करना अच्छा है, पर आर्टिफिशियल स्वीटनर का अत्यधिक उपयोग समस्याग्रस्त हो सकता है।

Clean Eating And Sugar Free Diet: आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और हेल्थ ऐप्स ने लोगों के खानपान और डाइट को देखने का नजरिया ही बदल दिया है. इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब वीडियोज के साथ अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर आए दिन नए-नए डाइट ट्रेंड वायरल होते रहते हैं. Clean Eating और Sugar-Free डाइट का चलन भी इन दिनों तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन, पहले हर किसी के लिए ये समझ लेना बेहद जरूरी है कि आखिर सेहत के लिए क्लीन ईटिंग के असल मायने क्या हैं और Sugar Free डाइट कितना सही है? आइए एक्सपर्ट से जानें... सेहत के लिए क्लीन ईटिंग के सही मायने Healthpil.com के फाउंडर और जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला के मुताबिक, आज के समय में क्लीन ईटिंग और शुगर-फ्री डाइट का चलन इतना तेज है कि कई लोग अच्छी आदत बनाने के बजाय खाने से डरने लगते हैं. क्लीन ईटिंग का मतलब Detox Drinks, Gluten Free या महंगे Health Products नहीं है. इसका सीधा सा अर्थ है रोज की थाली को पौष्टिक और संतुलित बनाना, जिसमें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, सब्जियां, दालें, फल हों, और अनाज सीमित मात्रा में हों, जबकि पैक्ड अल्ट्रा प्रोसेस्ड स्नैक्स, ज्यादा मीठा, स्वीट ड्रिंक्स और बार-बार तला हुआ खाना कम किया जाए. अगर यह सही तरीके से किया जाए, तो वजन नियंत्रण में आता है, ब्लड शुगर कंट्रोल में रहता है और Lipid Profile भी सुधरती है. यह भी पढ़ें: Iceberg of Illness: HIV-AIDS या टीबी…, जब मरीज के लिए बीमारी से ज्यादा खतरनाक हो जाए सोशल स्टिग्मा डेली डाइट में Carbohydrate का एकतरफा दबदबा डॉ. राहुल चावला के मुताबिक, हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारी Diet में अक्सर Carbohydrate का एकतरफा दबदबा रहता है. सुबह नाश्ते से लेकर रात के खाने तक रोटी, चावल, ब्रेड, बिस्किट बहुत ज़्यादा होते हैं, प्रोटीन बहुत कम. ऐसे में पेट भर जाता है, लेकिन तृप्ति नहीं आती, भूख जल्दी लग जाती है और क्रेविंग बनी रहती हैं, जिससे लोग बार-बार खाने लगते हैं. खाने का यह पैटर्न आगे चलकर इंसुलिन रेजिस्टेंस, फैटी लिवर और वजन बढ़ने की जमीन तैयार करता है. कैसे सुधारें अपनी डाइट? एक्सपर्ट के मुताबिक, इसे सुधारने का व्यावहारिक तरीका यह है कि हर मुख्य भोजन में प्रोटीन का एक साफ हिस्सा रखा जाए, जैसे दाल के साथ दही, पनीर, अंडा, मछली या सोया, और आधी थाली सब्जी या सलाद से भरी हो. इसके अलावा आपको रोटी या चावल बंद करने की जरूरत नहीं है, बस मात्रा समझदारी से रखनी होती है. प्रोटीन की सही मात्रा और सही सोर्स भी जरूरी डॉ. राहुल चावला के मुताबिक, एक नई धारणा भी तेज़ी से बढ़ी है. लोग अचानक बहुत ज्यादा प्रोटीन लेना शुरू कर देते हैं और डाइट में खूब प्रोटीन पाउडर और सप्लीमेंट्स शामिल कर रहे हैं, पानी ठीक से नहीं पीते. लेकिन, यह भी उतना ही गलत है. एक्सपर्ट के मुताबिक, प्रोटीन जरूरी है, लेकिन इसके लिए सही मात्रा और सही सोर्स का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. शुगर फ्री डाइट चीनी सेहत के लिए कितना खतरनाक है, यह हर कोई जानता है. ऐसे में चीनी से होने वाले नुकसान से बचने के लिए इन दिनों शुगर-फ्री डाइट का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है. डॉ. राहुल चावला के मुताबिक, मीठा कम करना सही दिशा है, लेकिन हर चीज में आर्टिफिशियल स्वीटनर डालना लॉन्ग टर्म समाधान नहीं है. Aspartame को IARC ने Possibly Carcinogenic (Group 2B) कहा है, जबकि सामान्य मात्रा में इसे सुरक्षित माना गया है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि रोज बड़ी मात्रा में इसका इस्तेमाल किया जाए. यह भी पढ़ें: Nipah Virus Myths or Facts: निपाह वायरस कहां से आया? जानें इससे जुड़े आम मिथक और उनकी सच्चाई एक्सपर्ट के मुताबिक Sucralose और दूसरे Sweeteners कुछ लोगों में गैस, ब्लोटिंग, दस्त या पेट की गड़बड़ी बढ़ा सकते हैं. वहीं Gut Microbiome पर इनके असर को लेकर अभी शोध चल रहा है. एक्सपर्ट का कहना है कि Sweeteners मीठे की आदत को खत्म नहीं करते, बल्कि क्रेविंग को बनाए रखते हैं. ऐसे में हर किसी के लिए लक्ष्य मीठे को रिप्लेस करना नहीं, बल्कि मीठे की आदत को धीरे-धीरे कम करने का होना चाहिए. डिस्क्लेमर- यह खबर सामान्य जानकारी के आधार पर लिखी गई है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टी नहीं करता है. अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से संपर्क करें.

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