Thursday, January 22, 2026
Geopolitics
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चागोस द्वीप पर ट्रंप का गुस्सा: जानें ब्रिटेन और भारत की डील का सच

Hindustan
January 21, 20261 day ago
ऐसी मूर्खता नहीं देखी... चागोस को लेकर ब्रिटेन पर क्यों भड़के ट्रंप? डील में शामिल था भारत

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने के ब्रिटिश फैसले की आलोचना की है। उन्होंने इसे ब्रिटेन की कमजोरी बताया। पहले ट्रंप ने इस सौदे का समर्थन किया था, लेकिन अब वे इसका विरोध कर रहे हैं। डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा है, जो हिंद महासागर में महत्वपूर्ण है। भारत ने मॉरीशस के दावे का समर्थन किया और बातचीत में भूमिका निभाई।

हिंद महासागर के बीचों-बीच एक छोटा-सा द्वीप समूह है जिसे चागोस आइलैंड्स कहते हैं। इनमें सबसे बड़ा और सबसे चर्चित द्वीप है डिएगो गार्सिया। ये जगह इतनी दूर-दराज है कि नक्शे पर भी मुश्किल से दिखती है, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों के लिए ये बेहद अहम है। यही वजह है कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने के ब्रिटिश सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की है। समझौते के आठ महीने बाद, ट्रंप ने इसे ब्रिटेन की पूर्ण कमजोरी और महामूर्खता करार दिया है। यह बयान भू-राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रहा है, क्योंकि यह न केवल अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों में तनाव का संकेत है, बल्कि ट्रंप प्रशासन के पिछले बयानों से भी बिल्कुल उलट है। प्यार से लेकर प्रमोशन तक 2026 का पूरा हाल जानें ✨अभी पढ़ें ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर क्या कहा? अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक तीखी पोस्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिटेन की आलोचना करते हुए लिखा कि एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डे (डियागो गार्सिया) वाली जमीन को बिना किसी कारण के छोड़ना एक चौंकाने वाला कदम है। ट्रंप ने अपनी पोस्ट में मुख्य रूप से तीन बातें कहीं- कमजोरी का प्रदर्शन: उन्होंने कहा- इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन और रूस ने इस पूर्ण कमजोरी के कृत्य को देखा है। ये अंतर्राष्ट्रीय ताकतें केवल 'शक्ति' को पहचानती हैं। ब्रिटेन पर तंज: उन्होंने अपने नाटो सहयोगी ब्रिटेन को व्यंग्यात्मक रूप से प्रतिभाशाली कहा और आरोप लगाया कि वे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमि को दे रहे हैं। ग्रीनलैंड का जिक्र: ट्रंप ने इस मुद्दे को ग्रीनलैंड से जोड़ते हुए कहा- यह एक और राष्ट्रीय सुरक्षा कारण है कि ग्रीनलैंड का अधिग्रहण क्यों किया जाना चाहिए। डेनमार्क और उसके सहयोगियों को सही काम करना चाहिए। यू-टर्न: पहले समर्थन, अब विरोध? ट्रंप का यह ताजा हमला हैरान करने वाला है क्योंकि यह उनके प्रशासन के पिछले रुख और खुद उनके बयानों के विरोधाभास में है। फरवरी में समर्थन: ब्रिटिश पीएम स्टार्मर की अमेरिका यात्रा के दौरान, ट्रंप ने संकेत दिया था कि वह चागोस सौदे का समर्थन करेंगे। उन्होंने तब कहा था कि वे बहुत लंबी अवधि की, शक्तिशाली लीज (करीब 140 साल) की बात कर रहे हैं... मुझे लगता है कि हम आपके देश के साथ जाने के लिए इच्छुक होंगे। मई 2025 में आधिकारिक स्वागत: मई में, ट्रंप प्रशासन के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस समझौते का स्वागत किया था। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक समझौता और स्मरणीय उपलब्धि बताया था जो अमेरिका-ब्रिटेन संबंधों की स्थायी ताकत को दर्शाता है। अब सवाल यह उठता है कि कुछ ही महीनों में ऐसा क्या बदल गया कि ऐतिहासिक उपलब्धि अब महामूर्खता में बदल गई? क्या है चागोस समझौता? मॉरीशस दशकों से चिल्लाता आ रहा था कि ब्रिटेन ने गलत तरीके से इन द्वीपों को छीन लिया। 2019 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने फैसला दिया कि ब्रिटेन को चागोस मॉरीशस को लौटाने चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने भी कई बार ब्रिटेन पर दबाव डाला। आखिरकार 2024 में ब्रिटेन की नई लेबर सरकार यानी प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने मॉरीशस के साथ लंबी बातचीत के बाद एक समझौता किया। मई 2025 में ये डील साइन हो गई। डील के तहत ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह की पूरी संप्रभुता (यानी मालिकाना हक) मॉरीशस को सौंप दी। यानी अब ये द्वीप कानूनी रूप से मॉरीशस के होंगे। लेकिन डिएगो गार्सिया पर मौजूद सैन्य अड्डे को ब्रिटेन ने 99 साल के लिए लीज (किराए) पर रख लिया और ये लीज आगे बढ़ाई भी जा सकती है। बदले में ब्रिटेन ने मॉरीशस को 101 मिलियन पाउंड (लगभग 136 मिलियन डॉलर) प्रति वर्ष देने का वादा किया है। समझौते की पूरी अवधि में यह राशि लगभग 3.4 बिलियन पाउंड होगी। यह हर साल के हिसाब से काफी बड़ी रकम है। ब्रिटेन का कहना था कि ये डील जरूरी थी क्योंकि अदालतें और अंतरराष्ट्रीय दबाव से बेस पर खतरा मंडरा रहा था। शुरुआत में अमेरिका को इस डील से कोई समस्या नहीं थी। फरवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कीर स्टार्मर से मिलकर इसकी हामी भरी थी। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे मॉन्यूमेंटल अचीवमेंट तक कहा था। लेकिन जनवरी 2026 में अचानक सब बदल गया। अमेरिका को असली चिंता किस बात की है? दरअसल डिएगो गार्सिया उसकी सैन्य रणनीति का दिल है। मॉरीशस चीन के बहुत करीब है- चीन ने वहां बड़े निवेश किए हैं, पोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर में पैसा लगाया है। ट्रंप की पूरी पॉलिसी चीन को रोकने की है। उन्हें डर है कि भविष्य में मॉरीशस की सरकार बदल जाए, लीज का पालन न हो, या चीन किसी तरह दबाव डालकर बेस पर असर डाल दे। ट्रंप पहले सपोर्ट कर रहे थे, लेकिन अब शायद अपनी इमेज, या ग्रीनलैंड वाली बात को जोर देने के लिए, या बस राजनीतिक वजहों से विरोध कर रहे हैं। डील से जुड़ा था भारत चागोस द्वीप समझौते में भारत की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और कूटनीतिक भूमिका रही है। भारत ने दशकों से औपनिवेशिक शासन के खिलाफ मॉरीशस के दावे का समर्थन किया है और माना जाता है कि नई दिल्ली ने ही ब्रिटेन और मॉरीशस को बातचीत की मेज पर लाने में 'पर्दे के पीछे' से अहम भूमिका निभाई थी। भारत के लिए यह डील एक संतुलित जीत की तरह है क्योंकि इससे उसके करीबी सहयोगी मॉरीशस को संप्रभुता मिल गई, और साथ ही डियागो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य अड्डे के बने रहने से हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखना और शक्ति संतुलन बनाए रखना आसान होगा, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। इतिहास के पन्नों में चागोस: विस्थापन का दर्द चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर में स्थित 600 से अधिक द्वीपों का समूह है। इसका इतिहास औपनिवेशिक राजनीति और मानवाधिकार उल्लंघनों से भरा है। यह मूल रूप से मॉरीशस का हिस्सा था, लेकिन 1968 में मॉरीशस की आजादी से पहले ब्रिटेन ने इसे अलग कर दिया और 'ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी' (BIOT) बनाया। जबरन विस्थापन 1960 और 70 के दशक में, डियागो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने के लिए, ब्रिटेन ने वहां रहने वाले लगभग 2,000 चागोसियन (Ilois) को जबरन बाहर निकाल दिया। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना गया। दशकों के कानूनी दबाव के बाद ही ब्रिटेन संप्रभुता सौंपने को तैयार हुआ। डियागो गार्सिया का रणनीतिक महत्व क्यों है? 1960 और 1970 के दशक में ब्रिटेन ने इन द्वीपों पर अमेरिका के साथ मिलकर एक विशाल सैन्य अड्डा बना दिया। डिएगो गार्सिया पर बना ये जॉइंट अमेरिकी-ब्रिटिश बेस आज भी हिंद महासागर, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक इलाके में अमेरिका की सैन्य ताकत का सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना है। यहां से बॉम्बर प्लेन उड़ान भरते हैं, जासूसी विमान काम करते हैं। ट्रंप का गुस्सा इस द्वीप के इसी रणनीतिक महत्व से जुड़ा है। डियागो गार्सिया हिंद महासागर में अमेरिका और ब्रिटेन का एक प्रमुख 'लॉन्चपैड' है। यह अफ्रीका और इंडोनेशिया के बीचों-बीच स्थित है और मालदीव से 500 किमी दक्षिण में है। यहां से कई बड़े ऑपरेशन लॉन्च किए गए हैं। जैसे- 2001 में अफगानिस्तान में तालिबान और अल-कायदा पर हमले, 2024-25 में यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ बमबारी और गाजा के लिए मानवीय सहायता मिशन। चीन का डर हिंद महासागर में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और उसके मॉरीशस के साथ करीबी व्यापारिक संबंध हैं। ट्रंप का डर है कि संप्रभुता मॉरीशस के पास जाने से भविष्य में चीन इस क्षेत्र में सेंध लगा सकता है, भले ही लीज ब्रिटेन के पास हो।

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