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1954 का रहस्य: भेड़ियों के साथ रहने वाला लड़का

Navbharat Times
January 18, 20264 days ago
वह लड़का भेड़ियों के साथ रहता, बोलने पर गुर्राता और कच्चा मांस खाता

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1954 में लखनऊ रेलवे स्टेशन पर मिले नौ वर्षीय रामू को भेड़ियों के साथ रहने वाला 'वुल्फ बॉय' कहा गया। उसके पंजे जैसे हाथ-पैर, गुर्राना और कच्चा मांस खाना उसे अनोखा बनाते थे। कुछ डॉक्टरों का मानना था कि भेड़ियों ने उसे पाला था, जबकि जिम कॉर्बेट की थ्योरी अलग थी। रामू का 27 साल की उम्र में निधन हो गया।

नई दिल्ली: बात 1954 की है, जब एक 9 साल का लड़का लखनऊ रेलवे स्टेशन पर भूख के मारे बेहाल और कांपता हुआ मिला। उसकी शारीरिक बनावट कुछ अजीब सी थी। कुछ-कुछ भेड़िए जैसी। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि वह वेटिंग रूम में मिला तो कुछ ने बताया कि ट्रेन के खाली डिब्बे में मिला। उस वक्त यूपी के बलरामपुर शहर के अस्पताल में उसे ले जाया गया, जहां वह पत्रकारों, कैमरामैनों, राजनेताओं, डॉक्टरों, विद्वानों समेत हजारों लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। दुनिया के लिए अनोखे उस लड़के का नाम रखा रामू उस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं द टाइम और न्यूजवीक ने भी उस लड़के पर रिपोर्ट प्रकाशित कीं। उत्तर प्रदेश विधानसभा में उसके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए गए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी बरसों तक इस कहानी पर बारीकी से नजर रखी। उस लड़के का नाम रामू रखा गया। मुड़े हुए नाखून और पंजे जैसे हाथ-पैर, गुर्राता टाइम्स ऑफ इंडिया की एक स्टोरी में उन रिपोर्टों में रामू के बारे में कहा गया था कि उसके बाहर निकले हुए दांत, मुड़े हुए नाखून और पंजे जैसे हाथ-पैर थे। वह बोलता नहीं था, गुर्राता था। वह खड़ा नहीं हो सकता था। शुरू में, वह केवल कच्चा मांस खाता था। 16 जनवरी, 1954 को उसे वुल्फ बॉय नाम दिया गया। बोवाइन प्लूरिसी से संक्रमित था वह लड़का बाद में हुई पैथोलॉजिकल जांच से पता चला कि रामू 'बोवाइन प्लूरिसी' से संक्रमित था, जो जानवरों के साथ रहने का संकेत था। लेकिन यह विवाद कि वह भेड़िया लड़का था या विकृतियों के साथ पैदा हुआ इंसान, कभी सुलझा नहीं। दो डॉक्टरों ने कहा- लड़के को जानवरों ने पाला उस वक्त दो नामी डॉक्टरों डीएन शर्मा और बीएस अग्रवाल ने 14 वर्षों तक रामू का इलाज किया। उनका मानना था कि उसका पालन-पोषण भेड़ियों ने किया था। टीओआई ने लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के सर फिलिप मैनसन-बेहर का न्यूजवीक में छपा एक बयान प्रकाशित किया, जिन्होंने रामू की जांच की थी। उनका कहना था-निस्संदेह उसका पालन-पोषण किसी न किसी प्रकार के जानवर ने किया था। जिम कॉर्बेट की थ्योरी अलग थी हालांकि, लेखक जिम कॉर्बेट, जो तब तक केन्या में बस चुके थे, इस बात से असहमत थे। कॉर्बेट का मानना था कि रामू एक ऐसी मां का बच्चा था जो किसी कारणवश उसके जन्म को छिपाना चाहती थी। वह उसे एक ऐसी छोटी सी जगह में पालती थी, जहां केवल बिल्लियां और कुत्ते ही जा सकते थे। जब उसे पकड़े जाने का डर हुआ या वह उसे और खाना नहीं खिला सकती थी, तो उसने उसे रात में खाली डिब्बों में छोड़ दिया। यह जानते हुए कि उसे ढूंढ लिया जाएगा और उसकी देखभाल की जाएगी। बंगाल में भी दो लड़कियां ऐसी ही थीं शर्मा और अग्रवाल ने कॉर्बेट को जवाब देते हुए लिखा-हम उनका ध्यान अर्नोल्ड गेसल की 1941 में प्रकाशित पुस्तक ‘वुल्फ चाइल्ड एंड ह्यूमन चाइल्ड’ की ओर आकर्षित करना चाहते हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल में मिदनापुर की भेड़िया संतान कमला और अमला की जीवन कहानी का विस्तृत वर्णन है। शायद इससे उन्हें जंगली बच्चों की घटना की प्रामाणिकता का यकीन हो जाए। रामू का 27 वर्ष की आयु में 1968 में निधन हो गया। डॉक्टरों ने कहा कि वह ज्यादा जी चुका था, क्योंकि जानवरों की उम्र तकरीबन यही होती है। दुनिया में जंगली बच्चों के 5 और ऐसे मामले ऐसे कई वास्तविक मामले सामने आए हैं जिनमें जंगली बच्चे (लड़के और लड़कियां) इंसानों से अलग-थलग रहकर जानवरों के बीच रहकर जीवित रहे हैं। हालांकि, इन्हें अक्सर टार्जन या जंगल बुक जैसी कहानियों की तरह रोमांटिक अंदाज में पेश किया जाता है, लेकिन ये मामले आम तौर पर घोर उपेक्षा, दुर्व्यवहार या परित्याग का परिणाम होते हैं। दुनिया में 5 ऐसे बच्चों के बारे में जानते हैं। इवान मिशुकोव (रूस): चार साल की उम्र में, इवान एक दुर्व्यवहार करने वाले घर से भाग गया और 1990 के दशक में दो साल तक जंगली कुत्तों के एक झुंड के साथ रहा। कुत्तों ने उसकी रक्षा की और वह उनके साथ भोजन साझा करता था। बाद में उसे बचाया गया, उसका पुनर्वास किया गया और उसने फिर से बोलना सीखा। जॉन सेबुनिया (युगांडा): 1991 में तीन साल की उम्र में जॉन अपने पिता को अपनी मां की हत्या करते देखने के बाद जंगल में भाग गया। कहा जाता है कि उसे वर्वेट बंदरों के एक झुंड ने दो साल तक अपने पास रखा और पाला-पोसा, जब तक कि उसे ग्रामीणों ने नहीं ढूंढ लिया। दीना सानिचार (भारत): भारतीय भेड़िया बालक के नाम से चर्चित यह बच्चा 1867 में लगभग छह वर्ष की आयु में एक भेड़िये की मांद में पाया गया था। वह चारों पैरों पर चलता था और कच्चा मांस खाता था। उसने कभी मानवीय भाषा बोलना नहीं सीखा और 1895 में एक अनाथालय में उसकी मृत्यु हो गई। ट्रायन कैलडार (रोमानिया): 2002 में सात वर्ष की आयु में खोजा गया ट्रायन चार वर्ष की आयु में अपने दुर्व्यवहार करने वाले पिता से भागने के बाद संभवतः कुत्तों के साथ जंगल में रह रहा था। ओक्साना मलाया (यूक्रेन): तीन से आठ वर्ष की आयु के बीच ओक्साना को उसके शराबी माता-पिता ने घर से बाहर बंद कर दिया था और वह कुत्तों के साथ एक पिंजरे में रहती थी। उसमें कुत्तों जैसे व्यवहार विकसित हो गए थे। जैसे भौंकना और चारों पैरों पर दौड़ना, लेकिन बाद में उसका पुनर्वास किया गया। लेखक के बारे मेंदिनेश मिश्रदिनेश मिश्र, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में असिस्टेंट एडिटर हैं। अभी वह एक्सप्लेंड स्टोरीज, डीप रिसर्च, डेटा ड्रिवेन स्टोरीज करते हैं। इसके अलावा, ट्यूजडे ट्रीविया और वेडनेसडे बिग टिकट जैसी रेगुलर स्पेशल स्टोरीज भी करते हैं, जिनमें इन्फोग्राफिक्स, एक्सपर्ट बाइट और जर्नल्स का इस्तेमाल होता है। साथ ही यूएस न्यूज और गूगल ट्रेंड स्टोरीज भी करते हैं। NBT से पहले उन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल, पत्रिका, अमर उजाला और दैनिक जागरण के साथ 2010 से काम किया है। 2019 के लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग और अर्धकुंभ भी कवर किया है।... और पढ़ें

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    भेड़िये जैसा लड़का: 1954 की अनोखी कहानी