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भारत से यूएई को मिलेगा 'न्यूक्लियर अंब्रेला'? दिल्ली में हुई डील
News18 Hindi
January 20, 2026•2 days ago

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भारत और यूएई के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग पर समझौता हुआ है। इसमें स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स का निर्माण और संचालन शामिल है। 'न्यूक्लियर अंब्रेला' की चर्चाओं के बीच, विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग पर केंद्रित है, न कि परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर। यह भारत की 'नो फर्स्ट यूज' नीति और अमेरिका के साथ यूएई के संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।
Written by :
Gyanendra Mishra
Agency:News18Hindi
Last Updated:January 20, 2026, 16:04 IST
यूएई के राष्ट्रपति भारत आए तो कई समझाैते हुए, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा न्यूक्लियर डील की हो रही है. दावा किया जा रहा कि भारत ने यूएई को 'न्यूक्लियर अंब्रेला' देने का फैसला कर लिया है. लेकिन ये डील है क्या? क्या सच में भारत अपना परमाणु बम यूएई को देने जा रहा है?
भारत क्या UAE को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देने जा रहा है? ताकि कोई देश उस पर परमाणु हमला करे तो वो भी जवाब दे सके? इसकी चर्चा जोरों पर है. क्योंकि यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान डेढ़ घंटे के लिए भारत आए तो जिन समझौतों पर दस्तखत हुए उनमें न्यूक्लियर डील भी है. इसमें ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ और ‘ऑपरेशन’ पर बात की गई है. तो क्या भारत अब अपनी सरहदों से बाहर निकलकर यूएई को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ यानी परमाणु सुरक्षा कवच देने जा रहा है? अगर ऐसा है तो पाकिस्तान और सऊदी अरब की बेचैनी बढ़नी तय है.
सबसे पहले हमें इस समझौते की टर्मिनोलॉजी को समझना होगा. पीएमओ की ओर से जारी बयान के अनुसार, दोनों देश एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर साथ काम करेंगे. मिलकर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स बनाएंगे. उनका इस्तेमाल करेंगे. साथ ही, एडवांस रिएक्टर सिस्टम, न्यूक्लियर पावर प्लांट ऑपरेशंस और मेंटेनेंस पर भी साथ काम करेंगे. इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी (Nuclear Safety) का जिक्र किया गया, चर्चा सबसे ज्यादा इसी पर है.
हालांकि, इसके दो मतलब हैं.
तकनीकी तौर पर देखें तो ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ का मतलब है, न्यूक्लियर प्लांट को चर्नोबिल या फुकुशिमा जैसे हादसों से बचाना, रेडिएशन लीक को रोकना और परमाणु कचरे को सही से ठिकाने लगाना. यूएई के पास ‘बराकाह’ न्यूक्लियर प्लांट है. भारत के पास 50 वर्षों से अधिक का सिक्योर न्यूक्लियर पावर प्लांट चलाने का अनुभव है. ऐसे में भारत यूएई की सेफ्टी प्रोटोकॉल फॉलो करने में मदद कर सकता है.
और दूसरा, बाहरी हमलों से सुरक्षा? तकनीकी भाषा में इसे Nuclear Security या Physical Protection कहा जाता है, न कि Nuclear Safety. ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ का मतलब होता है… एक्सटेंडेड डिटरेंस. यानी अगर कोई तीसरा देश यूएई पर हमला करता है, तो भारत अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करके यूएई का बचाव करेगा. साफ है कि इस भाषा से तो पता नहीं चलता.
तो फिर सवाल क्यों?
कूटनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि ऐसी डील्स के डिटेल्स सामने नहीं आते. और जिस तरह की गतिविधियां सामने आ रही हैं. निश्चित तौर पर यूएई ने भारत से इस तरह की कोई बात जरूर की है. भारत की ओर से भी सकारात्मक जवाब मिला होगा. क्योंकि यूएई के दुश्मन देश सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ एक एग्रीमेंट किया है, जिसमें ऐसे ही सिक्योरिटी कवर की बात है.
क्या भारत ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ दे सकता है?
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच जिस न्यूक्लियर डील की बातें की जाती हैं, वैसा भारत और UAE के बीच होना फिलहाल मुश्किल और बेहद पेचीदा है. इसके पीछे कई ठोस वजह हैं.
भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ पॉलिसी: भारत की न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन कहती है कि हमारे परमाणु हथियार केवल डिटरेंस यानी बचाव के वक्त इस्तेमाल करने के लिए हैं, भारत पहले इनका इस्तेमाल नहीं करेगा. ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देने का मतलब है कि भारत को अपनी इस नीति को बदलना होगा. यह ऐलान करना होगा कि UAE पर हमला भारत पर हमला माना जाएगा. इसलिए ये आसान नहीं.
अमेरिका का फैक्टर: UAE को सिक्योरिटी देना अभी अमेरिका की जिम्मेदारी है. यूएई में अमेरिकी आर्मी बेस मौजूद हैं. यूएई ने अमेरिका के साथ ‘123 एग्रीमेंट’ किया है, जिसके तहत उसने कसम खाई है कि वह न तो यूरेनियम एनरिच करेगा और न ही फ्यूल को री-प्रोसेस करेगा. अगर भारत वहां ‘सुरक्षा कवच’ देता है, तो यह अमेरिका से टकराने जैसा होगा.
[q] पाकिस्तान-सऊदी मॉडल अलग क्यों?[/q]
पाकिस्तान और सऊदी अरब का मामला अलग है. पाकिस्तान आर्थिक रूप से कमजोर है, उसे सऊदी के ‘पेट्रो-डॉलर’ की सख्त जरूरत है. बदले में वह अपनी सेना या परमाणु तकनीक देने को तैयार हो सकता है. जबकि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. भारत को UAE के पैसों के लिए अपनी परमाणु संप्रभुता गिरवी रखने की जरूरत नहीं.
[q] फिर इस एग्रीमेंट के ‘मायने’ क्या हैं?[/q]
रक्षा विशेषज्ञ और पूर्व राजनयिक इस समझौते को आर्मी सिक्योरिटी के बजाय एनर्जी सिक्योरिटी और टेक्नो डिप्लोमेसी चश्मे से देख रहे हैं. स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स आने वाले वर्षों असली गेम चेंजर होंगे. ये छोटे हैं, सुरक्षित हैं और कम खर्चीले हैं. भारत ऐसी टेक्नोलॉजी भी डेवलप कर रहा है. दूसरी वजह UAE तेल पर अपनी निर्भरता कम करके ‘ग्रीन एनर्जी’ की तरफ बढ़ रहा है.
[q] भारत यूएई से क्या चाहता है?[/q]
भारत, यूएई को स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स बेचना चाहता है. ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ और ‘मेनटेनेंस’ उसी डील का हिस्सा है. भारत यह संदेश देना चाहता है कि हम न केवल रिएक्टर बनाएंगे, बल्कि उसे सुरक्षित चलाने की गारंटी भी देंगे. यह चीन को टक्कर देने की एक चाल है, जो मध्य पूर्व में अपनी परमाणु तकनीक बेचने की कोशिश कर रहा है.
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Gyanendra Mishra
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Location :
Delhi,Delhi,Delhi
First Published :
January 20, 2026, 16:04 IST
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