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भारत-ईयू 'मदर ऑफ़ ऑल डील्स': एफटीए की बड़ी घोषणा
BBC
January 21, 2026•1 day ago

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भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) 27 जनवरी को एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले हैं, जिसे 'सभी समझौतों की जननी' कहा जा रहा है। यह समझौता दोनों पक्षों के बाजारों तक पहुंच को आसान बनाएगा, जिससे दो अरब लोगों का बाजार बनेगा। ईयू अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि इससे ईयू को 'फर्स्ट मूवर एडवांटेज' मिलेगा।
भारत और यूरोपियन यूनियन में ऐसा क्या होने जा रहा है कि ईयू ने कहा- मदर ऑफ़ ऑल डील्स
एक घंटा पहले
भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) की घोषणा 27 जनवरी को होने जा रही है.
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी मुक्त व्यापार समझौते के तहत दो देश एक दूसरे के लिए अपने बाज़ार में पहुँच को आसान बनाते हैं. अगर ईयू और भारत में एफ़टीए होता है तो भारत के सामानों को ईयू के देशों के बाज़ार में कम टैरिफ या बिना किसी टैरिफ़ के पहुँच मिलेगी और ईयू के सामान को भारत के बाज़ार में भी उसी रूप में पहुँच मिलेगी.
भारत ने अपने 77वें गणतंत्र दिवस के मौक़े पर ईयू के प्रतिनिधियों को ही मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है.
यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने मंगलवार को स्विटज़रलैंड के दावोस में कहा कि ईयू भारत के साथ एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला है.
उन्होंने कहा कि इससे 27 देशों के इस समूह को 'फर्स्ट मूवर एडवांटेज' मिलेगा यानी इस स्तर का एफ़टीए किसी और ने भारत से किया नहीं है, इसलिए ईयू को इसका फ़ायदा पहले मिलेगा.
दावोस में एक भाषण में उन्होंने कहा, "दावोस के तुरंत बाद, अगले हफ़्ते मैं भारत जाऊँगी. अभी कुछ काम बाक़ी हैं लेकिन हम एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बिल्कुल क़रीब हैं. वास्तव में कुछ लोग इसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (सभी समझौतों की जननी) कह रहे हैं.''
''यह ऐसा समझौता होगा जो दो अरब लोगों का बाज़ार बनेगा, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग एक चौथाई के बराबर होगा और सबसे अहम बात यह कि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते और सबसे गतिशील महाद्वीपों में से एक के साथ यूरोप को 'फर्स्ट मूवर एडवांटेज' मिलेगा."
अमेरिका का बढ़ता दबाव
भारत और ईयू उस समय एफ़टीए करने जा रहे हैं, जब अमेरिका का दबाव पूरी दुनिया में बढ़ता जा रहा है. भारत अमेरिका का 50 फ़ीसदी टैरिफ़ झेल रहा है और ट्रेड डील पर कोई सहमति नहीं बन पाई है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और ट्रेड सरप्लस भारत का है. ऐसे में भारत को भारी नुक़सान हो रहा है.
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दूसरी तरफ़ यूरोप भी ट्रंप की नीतियों के कारण भारी दबाव में है. यूरोप पहले से ही यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण मुश्किल में था और अब ट्रंप ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़े की बात कर रहे हैं.
ट्रंप ने यहाँ तक धमकी दी है कि ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़े का जो भी देश विरोध करेगा, उस पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ़ लगेगा. रूसी नेता भी यूरोप और अमेरिका के संबंधों पर तंज़ कस रहे हैं.
रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने एक्स पर 18 जनवरी को लिखा था, ''मेक अमेरिका ग्रेट अगेन मतलब डेनमार्क को फिर से छोटा करो मतलब यूरोप को फिर से ग़रीब बनाओ. अक्ल के दुश्मनों क्या यह बात अब आपको समझ में आई?''
कहाँ यूरोप उम्मीद कर रहा था कि ट्रंप यूक्रेन में रूस पर दबाव डालकर युद्ध ख़त्म कराएंगे लेकिन उसे अमेरिका के कारण ही नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे में यूरोप भी अमेरिकी बाज़ार का विकल्प तलाश रहा है. भारत न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन से पहले ही एफ़टीए कर चुका है.
यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि यूरोप इस सदी के 'ग्रोथ सेंटर्स' और आर्थिक महाशक्तियों लैटिन अमेरिका से लेकर इंडो-पैसिफ़िक तक के साथ कारोबार करना चाहता है.
उर्सुला और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा, दोनों ही अगले सप्ताह गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे. वे 27 जनवरी को होने वाले 16वें भारत–ईयू शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी करेंगे.
दशकों की बातचीत का नतीजा
पिछले सप्ताह वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी आगामी भारत–ईयू व्यापार समझौते को 'सभी व्यापार समझौतों की जननी' बताया था. उन्होंने कहा था कि यह समझौता, जिसके 27 जनवरी को हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, व्यापक होगा और दोनों पक्षों के हितों के साथ संवेदनशीलताओं का ध्यान रखेगा.
भारत–ईयू व्यापार समझौता बनने में दशकों का समय लगा है. जुलाई 2022 में बातचीत दोबारा शुरू होने के बाद दोनों पक्ष अंततः समझौते पर हस्ताक्षर के क़रीब पहुँचे हैं. हालांकि बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन 2013 में इसे छोड़ दिया गया था.
भारत एफ़टीए को लेकर बहुत सतर्क रहा है. अमेरिका सहित कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ भारत पर अपने कृषि क्षेत्र तक ज़्यादा पहुँच देने का दबाव बना रही हैं.
हालांकि, कृषि उत्पाद लंबे समय से भारत के लिए एक 'रेड लाइन' रहे हैं. पिछले महीने, जब नई दिल्ली ने न्यूज़ीलैंड के साथ एक व्यापार समझौते की घोषणा की, तो उसके तुरंत बाद भारत के व्यापार मंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह समझौता उसके किसानों के हितों की "रक्षा" करता है.
यह हिचकिचाहट घरेलू राजनीतिक कारणों को दर्शाती है. दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं, जहाँ लाखों छोटे किसान दो हेक्टेयर से कम भूमि के मालिक हैं.
यूरोपीय संघ (ईयू) भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2023–24 में दोनों के बीच कुल व्यापार 137.4 अरब डॉलर का रहा.
अमेरिका रूस के साथ व्यापारिक हितों पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है, ऐसे में यूरोप की भारत सहित अन्य साझेदारियों की ज़रूरत को और बढ़ा दिया है. उधर, नरेंद्र मोदी भी ऐसे नए साझेदारों की तलाश में हैं जो निवेश और तकनीक तक पहुँच दिलाएँ और रोज़गार बढ़ाने में मदद करें.
उर्सुला ने कहा कि यूरोप, अरब प्रायद्वीप के रास्ते महाद्वीप को भारत से जोड़ने वाले एक नए व्यापारिक गलियारे में निवेश करेगा. यह व्यापार मार्ग, जिसे भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा कहा जाता है, 2023 में अमेरिका और खाड़ी देशों के समर्थन से घोषित किया गया था. हालांकि ग़ज़ा में इसराइल के सैन्य अभियान के बाद इस पर काम ठहर गया था.
भारत ने अमेरिका के बाज़ार तक पहुँच में आई कमी की भरपाई के लिए न्यूज़ीलैंड, चिली, पेरू, ब्रिटेन और ओमान सहित कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर बातचीत भी तेज़ कर दी है. इनमें से कुछ देशों के साथ एफ़टीए हो भी गया है. जुलाई में भारत ने ब्रिटेन के साथ एक एफटीए पर मुहर लगाई, जिसके तहत कारों से लेकर शराब तक कई उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर दिए गए.
फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. इसके बाद से भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 10 अरब डॉलर से 63 अरब डॉलर तक पहुँच गया था.
लेकिन यूरोप चाहता है कि भारत की रूस पर निर्भरता कम हो. यूरोप न केवल ऊर्जा के मामले में भारत की रूस पर निर्भरता कम करना चाहता है बल्कि रक्षा उपकरणों के मामले में भी यही चाहता है.
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