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भारत-ईयू एफटीए: 18 साल की लंबी बातचीत के बाद, व्यापार समझौता अंतिम पड़ाव पर

Navbharat Times
January 19, 20263 days ago
India-EU FTA: भारत 18 साल से कर रहा था कोशिश, अब अंजाम बहुत करीब, क‍िस बात का अभी भी सता रहा डर?

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भारत और यूरोपीय संघ दो दशकों की बातचीत के बाद एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप देने के कगार पर हैं। यह समझौता वस्तुओं, सेवाओं और व्यापार नियमों को शामिल करेगा और भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार सौदा होगा। हालांकि, जलवायु-संबंधित कर, सेवाओं की आवाजाही और गैर-टैरिफ बाधाएं जैसे अनसुलझे मुद्दे इसके अंतिम स्वरूप को प्रभावित करेंगे।

नई दिल्‍ली: भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलने वाला है। लगभग दो दशकों की लंबी बातचीत के बाद दोनों एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप देने के कगार पर हैं। यह समझौता सिर्फ व्यापारिक फायदों के लिए ही नहीं है। इसके बजाय भू-राजनीतिक समीकरणों को भी ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे जटिल व्यापार समझौता होगा। इसमें वस्तुओं, सेवाओं और व्यापार नियमों को शामिल किया जाएगा। यह समझौता भारत के लिए आर्थिक विकास का कैटेलिस्‍ट बन सकता है। लेकिन, कुछ अनसुलझे मुद्दे जैसे जलवायु-संबंधी टैक्‍स, सेवाओं की आवाजाही और गैर-टैरिफ बाधाएं, इसके अंतिम स्वरूप और प्रभाव को तय करेंगे। यह बहुप्रतीक्षित भारत-ईयू एफटीए लगभग पूरा हो चुका है। इसकी औपचारिक घोषणा इसी महीने भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान होने की उम्मीद है। भारत 27 जनवरी को यूरोपीय संघ (ईयू) के शीर्ष नेतृत्व की मेजबानी करेगा। ये भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में भी शामिल होंगे। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह समझौता हो जाता है तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे जटिल व्यापार समझौता होगा। इसमें ईयू के 27 सदस्य देशों के कस्‍टम्‍स यानी सीमा शुल्क संघ के तहत आने वाली वस्तुएं, सेवाएं और व्यापार नियम शामिल होंगे। हालांकि, इस समझौते से दोनों पक्षों को साफ आर्थिक लाभ होने की उम्मीद है। जीटीआई ने कुछ अनसुलझे मुद्दों पर चिंता जताई है। इनमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े टैक्‍स (जैसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म - CBAM), सेवाओं के क्षेत्र में पेशेवरों की आवाजाही और गैर-टैरिफ बाधाएं (जैसे आयातित उत्पादों के लिए जटिल प्रमाणन प्रक्रियाएं) शामिल हैं। यही मुद्दे तय करेंगे कि यह समझौता विकास को बढ़ावा देगा या फिर एकतरफा सौदा साबित होगा। अचानक कैसे आई तेजी? भारत और ईयू के बीच बातचीत 2007 में एक व्यापक व्यापार और निवेश समझौते के तहत शुरू हुई थी। इसे बीटीआईए यानी ब्रॉड-बेस्‍ड ट्रेड एंड इन्‍वेस्‍टमेंट एग्रीमेंट कहा गया। लेकिन, ऑटोमोबाइल, शराब, डेटा नियम, सार्वजनिक खरीद, बौद्धिक संपदा और लेबर स्‍टैंडर्ड्स जैसे विवादास्पद मुद्दों पर बार-बार गतिरोध आया। 2013 के बाद यह बातचीत प्रभावी रूप से रुक गई थी। 2022 में वैश्विक व्यापार परिदृश्य में आए बड़े बदलावों के बीच इन वार्ताओं को फिर से शुरू किया गया। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के दौरान बढ़ी संरक्षणवादी नीतियां, सप्‍लाई चेन में आई बाधाएं और चीन पर अपनी निर्भरता कम करने का यूरोप का जोर, इन सबने नई तात्कालिकता पैदा की। दोनों पक्षों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित किया। उन्होंने कृषि जैसे सबसे संवेदनशील मुद्दों को अलग रखा। एक ऐसे समझौते पर फोकस किया जो सर्व-समावेशी के बजाय 'कार्यान्वयन योग्य' हो। इस बदलाव को दर्शाते हुए समझौते का नाम अब आधिकारिक तौर पर भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता है। निवेश संरक्षण और भौगोलिक संकेत जैसे मुद्दों पर अलग से बातचीत की जा रही है। न कि इन्‍हें एक ही बड़े समझौते में शामिल किया जा रहा है। एफटीए भारत की रणनीति का हिस्सा पिछले चार वर्षों में यह ईयू समझौता भारत का नौवां व्यापार समझौता होगा। यह भारत की तेज रफ्तार से एफटीए करने की रणनीति को दर्शाता है। 2021 के बाद से भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ईएफटीए ब्लॉक और ब्रिटेन (यूके) जैसे देशों के साथ समझौते किए हैं। इसके अलावा, भारत इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी सक्रिय है। नई दिल्ली के नीति निर्माताओं के लिए ईयू के साथ यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ईयू दुनिया के सबसे अमीर बाजारों में से एक है। इसकी आबादी 45 करोड़ है और अर्थव्यवस्था का मूल्य 18 ट्रिलियन से 22 ट्रिलियन यूरो के बीच है। यह एक ऐसा बाजार है जहां 2023 में ईयू की ओर से सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) के लाभ वापस लेने के बाद भारतीय निर्यातकों को नुकसान हुआ था। भारत को क्या मिलेगा? जीटीआई के अनुसार, भारत पहले से ही ईयू में अपेक्षाकृत कम औसत टैरिफ का सामना करता है जो वित्तीय वर्ष 2025 में लगभग 76 अरब डॉलर के माल निर्यात पर लगभग 3.8% है। हालांकि, कपड़ा और परिधान जैसे प्रमुख श्रम-गहन क्षेत्रों में अभी भी लगभग 10% टैरिफ लगता है। इन शुल्कों को हटाने से गारमेंट्स, चमड़ा, जूते और अन्य रोजगार-उन्मुख उद्योगों को सीधा लाभ होगा, जो वर्तमान में वैश्विक दबाव में हैं। एफटीए जीएसपी वापस लेने के बाद खोई हुई प्रतिस्पर्धात्मकता को भी बहाल करेगा। भारतीय निर्यातकों को अमेरिका की ओर से लगाए गए ऊंचे टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा। माल के अलावा, सेवाएं भारत के हितों के लिए केंद्रीय हैं। आईटी और अन्य कुशल सेवाओं के लिए गहरी पहुंच भारत को अमेरिकी बाजार पर अपनी भारी निर्भरता से विविधता लाने और अपने विशाल, कुशल कार्यबल का बेहतर लाभ उठाने की अनुमति दे सकती है। ईयू यह समझौता क्यों चाहता है? ईयू के लिए भारत एक ऐसा बाजार है जहां विकास की अपार संभावनाएं हैं, जो यूरोप में तेजी से दुर्लभ होती जा रही हैं। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद यह अभी भी अपेक्षाकृत संरक्षित बाजार है। ईयू के निर्यात को लगभग 9.3% का एवरेज वेटेज टैरिफ का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स, रसायन, प्लास्टिक और मशीनरी पर भारी शुल्क लगते हैं। टैरिफ में कमी से यूरोपीय निर्यातकों के लिए ऊंचे-मूल्य वाले निर्मित सामान, विमान, मशीनरी और रसायनों के क्षेत्र में अवसर खुलेंगे। सेवाओं, निवेश और सरकारी खरीद में बेहतर पहुंच से वाणिज्यिक संबंध और मजबूत होंगे। रणनीतिक रूप से भारत के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध यूरोप के सप्‍लाई चेन डायवर्सिफिकेशन और एशिया में एक मजबूत आर्थिक उपस्थिति के लक्ष्य के अनुरूप हैं। मुश्‍क‍िल सौदेबाजी के मुद्दे माल व्यापार अभी भी संवेदनशील बना हुआ है। ईयू अपने 95% से अधिक निर्यात पर टैरिफ समाप्त करने के लिए जोर दे रहा है। जबकि भारत लगभग 90% पर उदारीकरण के लिए तैयार है। कृषि और डेयरी को पूरी तरह से बाहर रखा गया है। यह भारतीय किसानों की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ऑटोमोबाइल और शराब सबसे कठिन क्षेत्रों में से हैं। यूरोपीय कार निर्माता पूरी तरह से निर्मित वाहनों पर भारत के आयात शुल्क में भारी कटौती चाहते हैं। जबकि नई दिल्ली घरेलू विनिर्माण को नुकसान पहुंचने और जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लिए मिसाल कायम करने से डरती है। कारों पर कोटा-आधारित समझौता उभर रहा है। शराब और स्पिरिट के मामले में भारत से नाटकीय कटौती के बजाय चरणबद्ध कमी की उम्मीद है। सेवाओं पर बातचीत गहरी संरचनात्मक दरारें उजागर करती है। भारत ईयू के जीडीपीआर (GDPR) शासन के तहत 'डेटा-सुरक्षित' देश के रूप में मान्यता, पेशेवरों की आसान आवाजाही, अल्पकालिक व्यापार वीजा और सामाजिक सुरक्षा पर टोटलाइजेशन एग्रीमेंट की मांग कर रहा है। इसके उलट, ईयू भारत के वित्तीय और कानूनी सेवा बाजारों में अधिक पहुंच और डेटा और नियामक मानकों पर सख्त संरेखण के लिए दबाव डाल रहा है। सरकारी खरीद, स्थिरता प्रतिबद्धताएं और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) अन्य विवादास्पद बिंदु हैं। ईयू भारत के विशाल सार्वजनिक खरीद बाजार तक पहुंच और श्रम और पर्यावरणीय मानकों पर बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं की मांग कर रहा है। भारत घरेलू नीति-निर्माण पर बाधाओं से सावधान रहते हुए सीमित पहुंच और गैर-बाध्यकारी भाषा को प्राथमिकता देता है। बौद्धिक संपदा के मामले में नई दिल्ली ईयू की ट्रिप्स-प्लस (TRIPS-plus) सुरक्षा की मांगों का विरोध कर रही है। इससे दवाओं की लागत बढ़ सकती है। भारत के जेनेरिक दवा उद्योग को कमजोर किया जा सकता है। भारत के लिए जोख‍िम जीटीआई ने दो ऐसे मुद्दों को उजागर किया है जो अनसुलझे रहने पर भारत के लाभ को काफी हद तक कम कर सकते हैं। पहला है ईयू का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM)। यह स्टील और एल्यूमीनियम जैसे आयात पर जलवायु-संबंधी शुल्क लगाता है। भले ही एफटीए के तहत टैरिफ समाप्त कर दिए जाएं, सीबीएएम एक प्रभावी नई बाधा के रूप में कार्य कर सकता है। यह विशेष रूप से एमएसएमई को नुकसान पहुंचाएगा। इनकी अनुपालन क्षमता सीमित है। भारत छूट, अलग प्रावधान या सुरक्षा उपायों की मांग कर रहा है। यह तर्क देते हुए कि इनके बिना यह समझौता संरचनात्मक रूप से असंतुलित होने का जोखिम उठाता है। दूसरा है ईयू की गैर-टैरिफ बाधाओं का घना जाल। इसमें दवा अनुमोदन में देरी, सख्त एसपीएस स्‍टैंडर्ड और रसायनों के लिए आरईएसीएच (REACH) जैसी जटिल प्रमाणन व्यवस्थाएं शामिल हैं। जीटीआई का कहना है कि नियामक सहयोग, तेज अनुमोदन और आपसी मान्यता के बिना केवल टैरिफ उदारीकरण से निर्यात लाभ में आनुपातिक बढ़ोतरी नहीं हो सकती है। आगे की क्‍या है राह? भारत और ईयू के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले से ही 190 अरब डॉलर से ज्‍यादा है। इसमें माल, सेवाएं और निवेश शामिल हैं। 2000 के बाद से भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह का लगभग 16.6% ईयू से आया है। एक एफटीए इस रिश्ते को वैश्विक अनिश्चितता के समय में और मजबूती से स्थापित कर सकता है। हालांकि, जैसा कि रिपोर्ट में जोर दिया गया है, अंतिम संतुलन महत्वपूर्ण होगा। समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाकी दरारों, सीबीएएम, सेवाओं की आवाजाही, गैर-टैरिफ बाधाओं और नियामक विषमताओं को कैसे संभाला जाता है। लेखक के बारे मेंअमित शुक्‍लाअमित शुक्‍ला, नवभारत टाइम्स डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं। वह 18 साल से भी ज्‍यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस दौरान उन्‍होंने बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार, शेयर मार्केट, राजनीति, देश-विदेश, प्रॉपर्टी, करियर जैसे तमाम विषयों को कवर किया है। पत्रकारिता और जनसंचार में PhD करने वाले अमित शुक्ला 7 साल से भी ज्‍यादा समय से टाइम्‍स इंटरनेट लिमिटेड के साथ जुड़े हैं। टाइम्‍स इंटरनेट में रहते हुए नवभारतटाइम्‍स डॉट कॉम से पहले इकनॉमिकटाइम्‍स डॉट कॉम में सेवाएं दीं। उन्‍होंने टीवी टुडे नेटवर्क, दैनिक जागरण, डीएलए जैसे मीडिया संस्‍थानों के अलावा शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी काम किया है। इनमें शिमला यूनिवर्सिटी- एजीयू, टेक वन स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (नोएडा) शामिल हैं। लिंग्विस्‍ट के तौर पर भी पहचान बनाई है। मार्वल कॉमिक्स ग्रुप, सौम्या ट्रांसलेटर्स, ब्रह्मम नेट सॉल्यूशन, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी और लिंगुअल कंसल्टेंसी सर्विसेज समेत कई अन्य भाषा समाधान प्रदान करने वाले संगठनों के साथ फ्रीलांस काम किया।... और पढ़ें

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    भारत-ईयू एफटीए: 18 साल की कोशिश, अंतिम चरण में