Thursday, January 22, 2026
Geopolitics
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भारत-अमेरिका रणनीतिक भरोसा: क्या ट्रंप कर रहे हैं सबसे बड़ी भूल?

Hindustan
January 21, 20261 day ago
भारत की अनदेखी अमेरिका को पड़ेगी भारी, क्या ट्रंप कर रहे हैं सबसे बड़ी भूल?

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भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध नाजुक दौर में हैं। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में व्यापारिक टकराव, राजनीतिक मतभेदों और मध्यस्थता के दावों से यह रिश्ता बिगड़ा है। पाकिस्तान के साथ ट्रंप की निकटता और भारत पर टैरिफ लगाने से नई दिल्ली नाराज हुई। लेख के अनुसार, अमेरिका को भारत को खोने और एशिया में अपनी रणनीति कमजोर होने का खतरा है, जिसे टैरिफ कम करने और मध्यस्थता के दावों से पीछे हटने से सुधारा जा सकता है।

भारत और अमेरिका के बीच पिछले दो दशकों में बना रणनीतिक भरोसा आज अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। कभी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत के मुकाबले एक-दूसरे के स्वाभाविक साझेदार माने जाने वाले ये दोनों देश अब कूटनीतिक गलतफहमियों, व्यापारिक टकराव और राजनीतिक अहम् के कारण दूरी की कगार पर खड़े हैं। अगर वाशिंगटन ने समय रहते अपने रवैये में सुधार नहीं किया, तो वह न केवल भारत जैसे निर्णायक वैश्विक साझेदार को खो सकता है, बल्कि एशिया में अपनी दीर्घकालिक रणनीति को भी कमजोर कर देगा। प्यार से लेकर प्रमोशन तक 2026 का पूरा हाल जानें ✨अभी पढ़ें जनवरी 2025 से पहले सब ठीक था दरअसल, जनवरी 2025 में जब डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार वाइट हाउस में लौटे, तो अमेरिका-भारत संबंध अपने चरम पर थे। ऐसा स्तर जो 20वीं सदी में शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। स्वतंत्रता के बाद पहले 50 वर्षों में नई दिल्ली वाशिंगटन को साम्राज्यवादी नजरिए से देखती थी, उसकी नीतियों की आलोचना करती थी और शीत युद्ध में गुटनिरपेक्षता की राह पर चली। लेकिन सोवियत संघ के पतन और नई सदी के साथ अमेरिकी नेतृत्व ने समझा कि बढ़ते चीन को रोकने के लिए भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार और अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़ा बाजार हो सकता है। दोनों दलों की सरकारों ने पिछले 25 वर्षों तक लगातार प्रयास किए। रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को गहरा किया, बार-बार उच्च-स्तरीय दौरे किए, प्रतिबद्धताएं दिखाईं। भारत की समान विचार वाली सरकारों ने भी सकारात्मक जवाब दिया। नतीजा यह हुआ कि औपचारिक सैन्य समझौतों और बढ़ते आर्थिक संबंधों के आधार पर दोनों देशों के बीच मजबूत बंधन बना। मई 2025 से बिगड़ने लगे हालात अब यह सारी उपलब्धि गंभीर खतरे में पड़ गई है। इस संकट की शुरुआत मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए चार दिवसीय संघर्ष (ऑपरेशन सिंदूर) से हुई, जब ट्रंप ने युद्धविराम करवाने का श्रेय खुद लेने की कोशिश की। इस्लामाबाद ने उनके दावे का समर्थन किया, उनकी 'निर्णायक राजनयिक भूमिका' की तारीफ की और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित कर दिया, यहां तक कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने वाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात के बाद इसकी सिफारिश की। लेकिन नई दिल्ली, जो सिद्धांत रूप में पाकिस्तान के साथ विवादों में विदेशी मध्यस्थता स्वीकार नहीं करती, ने साफ इनकार कर दिया कि अमेरिका की कोई भूमिका थी। 1972 के शिमला समझौते के तहत भारत द्विपक्षीयता पर अडिग रहा। मुनीर को वाइट हाउस बुला भारत को ट्रंप ने किया नाराज इसके बाद ट्रंप ने संघर्ष समाप्त होने के कुछ ही महीनों में आसिम मुनीर को ओवल ऑफिस में बुलाकर भारत को और नाराज कर दिया। उन्होंने भारत के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, भारतीय निर्यात पर 50% तक भारी टैरिफ लगा दिए और अगस्त 2025 में भारत को 'मृत अर्थव्यवस्था' तक कह डाला, खासकर रूसी तेल खरीद को लेकर। जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात साल में पहली बार चीन की यात्रा की (अगस्त 2025 में SCO शिखर सम्मेलन के लिए तियानजिन), जहां वे चीन और रूस के नेताओं से हाथ मिलाते नजर आए। ट्रंप ने निष्कर्ष निकाला कि अमेरिका ने 'भारत खो दिया है।' डगमगा रहा रिश्ता, लेकिन... हालांकि भारत और अमेरिका के बीच संबंध पूरी तरह टूटे नहीं हैं। नेताओं के बीच तनाव के बावजूद दोनों सरकारें पर्दे के पीछे सहयोग बनाए हुए हैं, जैसे एलपीजी आयात बढ़ाना, जेवलिन मिसाइल और सी हॉक हेलीकॉप्टर सौदे, मालाबार नौसैनिक अभ्यास। लेकिन रिश्ता बुरी तरह डगमगा रहा है और अगर इसे बचाना है तो अमेरिका को शीघ्र और बड़े कदम उठाने होंगे। इसके लिए सबसे पहले भारतीय उत्पादों पर लगे टैरिफ कम करने होंगे। दूसरा, भारत-पाकिस्तान शांति में अपनी भूमिका के दावों से पीछे हटना होगा और कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की पेशकश बंद करनी होगी। हालांकि ये मांगें ट्रंप के लिए कठिन हैं, क्योंकि वे व्यापार घाटा कम करने और नोबेल पुरस्कार पाने के सपने पर अड़े हैं। फिर भी संबंध सुधारना जरूरी है। भारत एक वैश्विक निर्णायक शक्ति है। उसका रुख अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को गहरे तक प्रभावित करता है। वह चीन की बढ़ती ताकत को अमेरिका की तरह चिंता की नजर से देखता है और हिंद-प्रशांत में लोकतांत्रिक देशों के मजबूत व एकजुट रहने का समर्थक है। अगर भारत दूर चला गया तो वाशिंगटन को उसकी कमी गहरी खलेगी। पहली बार ऐसा नहीं हुआ है हालांकि यह पहला संकट नहीं है। 1998 परमाणु परीक्षण प्रतिबंध, देवयानी खोबरागड़े मामला, एस-400 धमकी, लेकिन वर्तमान सबसे गहरा है। इससे मोदी को घरेलू राजनीति में झटका लगा, जनमत अमेरिका-विरोधी हो गया। सोशल मीडिया पर आलोचना तेज है। फिर भी सकारात्मक संकेत हैं। असली सुधार के लिए बड़े कदम चाहिए, टैरिफ कम करना, कृषि संरक्षणवाद स्वीकार करना। महंगाई की चिंता से ट्रंप ने कुछ टैरिफ पहले ही कम किए हैं। अमेरिका को समझना होगा कि हिंद-प्रशांत में भारत की भूमिका पाकिस्तान से कहीं अधिक रणनीतिक है। मजबूत भारत ही चीन पर दबाव बना सकता है। पाकिस्तान के बीजिंग से गहरे संबंध हैं, अमेरिकी निवेश के अवसर कम। उसके साथ निकटता भारत को नाराज करके क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचाएगी। इतना ही नहीं, ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि वह भारत-पाकिस्तान को बराबर नहीं मानता और कश्मीर में मध्यस्थता नहीं करेगा। तनाव नियंत्रण में पर्दे के पीछे भूमिका निभा सकता है, लेकिन शांत कूटनीति अपनानी होगी, क्योंकि विश्वास बनाना मुश्किल और खोना आसान होता है। संकट जितना लंबा खिंचेगा, सुधार उतना कठिन होगा। इसलिए अब कार्रवाई का समय है। संबंधों को सुधारो, खत्म मत होने दो।

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