Friday, January 23, 2026
Geopolitics
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भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी: परोपकार के मिथक को तोड़ें

Navbharat Times
January 18, 20264 days ago
भ्रम में जी रहा अमेरिका... अपने रणनीतिक परोपकार दिखाने वाले मिथक को छोड़ना होगा, जानें क्यों

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अमेरिका भारत के प्रति 'रणनीतिक परोपकार' के भ्रम में जी रहा है, जहां वह मानता है कि उसने भारत को बिना किसी शर्त के समर्थन दिया है। वास्तव में, अमेरिका भारत से बदले में अधिक बाजार पहुंच, रूस और ईरान पर कम निर्भरता, और चीन के मुकाबले समर्थन चाहता है। यह अवास्तविक उम्मीदें रिश्ते को खतरे में डाल रही हैं।

भारत-अमेरिका विवाद जैसे-जैसे छठे महीने में पहुंच रहा है, कई लोग इसे एक सफल रणनीतिक साझेदारी में एक अजीब घटना मान रहे हैं। वे इस संकट के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दोषी ठहराते हैं। वे लोग यह तर्क देते हैं कि उन्होंने भारत के साथ झगड़ा करने के लिए दशकों पुरानी अमेरिकी नीति से बेवजह किनारा कर लिया है। यह सोच गलत है। मौजूदा संकट का स्वरूप वाकई में ट्रंप जैसा ही है, उनकी दादागिरी वाली चालों की वजह से। हालांकि, इसके पीछे के तनाव के कारण उनके बनाए हुए नहीं हैं। असल में, भारत और अमेरिका पिछले कुछ सालों से किसी न किसी तरह के टकराव की ओर बढ़ रहे थे, चाहे वाइट हाउस में कोई भी रहा हो। रिश्ते में एक बड़ी दिक्कत यह है कि अमेरिका का मानना है कि उसने भारत के साथ दरियादिली दिखाई है, लेकिन बदले में उसे कुछ नहीं मिला। अमेरिकी पॉलिसी बनाने वाले अक्सर भारत के प्रति वॉशिंगटन के रवैये को बताने के लिए 'स्ट्रेटेजिक अल्ट्रूइज्म' (सामरिक परोपकार) शब्द का इस्तेमाल करते हैं। भारत को क्यों सपोर्ट कर रहा था अमेरिका कहानी यह है कि अमेरिका ने 2000 के दशक के बीच से भारत के उदय को बिना किसी लेन-देन की शर्त के सपोर्ट किया है, क्योंकि चीन के मुकाबले एक लोकतांत्रिक ताकत के तौर पर भारत का उभरना लंबे समय में अमेरिकी हितों के लिए फायदेमंद होता। देश अक्सर यह मानने लगते हैं कि वे अपने पार्टनर को जितना देते हैं, उससे अधिक पाते हैं। लेकिन 'स्ट्रेटेजिक अल्ट्रूइज्म' की कहानी इस सोच को एक खतरनाक भ्रम में बदल देती है। हालांकि भारत को इस पार्टनरशिप से निश्चित रूप से बहुत फायदा हुआ है, लेकिन वॉशिंगटन ने कभी भी बराबरी की मांग करने से पीछे नहीं हटा है। इसके अलावा, वह हमेशा नई दिल्ली से अपनी बात मनवाने के लिए कई तरह के तरीके अपनाने को तैयार रहा है, जिसमें पर्दे के पीछे से मनाना, राजनीतिक और डिप्लोमैटिक दबाव, और प्रतिबंधों की धमकी शामिल है। सच तो यह है कि अमेरिका ने 2000 के दशक के बीच में खुले दिल से कई डिप्लोमैटिक रियायतें देकर भारत को रणनीतिक पार्टनरशिप के लिए राजी किया था। उसने एडवांस्ड टेक्नोलॉजी तक पहुंच दी। भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग देखने का वादा किया। साथ ही, भारत को असल में एक न्यूक्लियर पावर के तौर पर पहचानने का सौदा किया। उसने यह भी वादा किया कि वह 21वीं सदी में भारत को एक बड़ी वर्ल्ड पावर बनने में मदद करेगा। भारत से क्या चाह रहा था अमेरिका? हालांकि, अमेरिका को बदले में बहुत कुछ चाहिए था। चीन के मुकाबले भारत को एक ताकत के तौर पर बढ़ावा देने के अलावा, वह अफगानिस्तान, ईरान और रूस के मामलों में नई दिल्ली का सहयोग चाहता था। भारतीय बाजारों तक अधिक पहुंच चाहता था, और भारत के डिफेंस इंपोर्ट और न्यूक्लियर सेक्टर में भी जगह बनाना चाहता था। उसे यह भी उम्मीद थी कि नई दिल्ली आखिरकार एशिया में सुरक्षा बनाए रखने में उसका कुछ बोझ बांटेगी। वॉशिंगटन को उम्मीद थी कि न्यूक्लियर डील खत्म होते ही उसे इसका फायदा मिलेगा। जब भारत ने अमेरिकी फाइटर जेट्स के बजाय फ्रेंच राफेल को चुना, तो उसने जोरदार विरोध किया। जब भारत ने न्यूक्लियर नुकसान के लिए सिविल लायबिलिटी एक्ट पास किया, जो अमेरिकी न्यूक्लियर इंडस्ट्री को पसंद नहीं था, तो अमेरिका बहुत गुस्सा हुआ। भारतीय संरक्षणवाद, विदेशी निवेश और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर कई कड़े व्यापार विवाद शुरू हो गए। ओबामा प्रशासन ने रिश्तों को ठंडा करके अपनी नाराजगी जाहिर की। जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) के तहत भारत के व्यापार लाभों को रद्द करने की धमकी दी। व्यापार के मुद्दों पर नई दिल्ली पर लगातार दबाव बनाया। नई चुनी गई मोदी सरकार ने कई बातों पर झुककर ही रिश्ते सुधारे, जैसे अमेरिका से अपने रक्षा खरीद को काफी बढ़ाना, परमाणु जवाबदेही के सवाल पर सहमति बनाना और अहम व्यापार मुद्दों पर सहमत होना। फिर पड़ने लगा अमेरिकी दबाव अमेरिका ने भारत पर दबाव डाला कि वह सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि दूसरी जगहों पर भी अमेरिकी जियोपॉलिटिकल प्रोजेक्ट्स के साथ चले। उदाहरण के लिए, उसने सिस्टमैटिक तरीके से नई दिल्ली को तेहरान से दूर किया। बुश एडमिनिस्ट्रेशन ने भारत को इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी में ईरान के खिलाफ वोट देने के लिए मनाय। इंडिया-पाकिस्तान-ईरान पाइपलाइन को खत्म करने के लिए दबाव डाला। ओबामा एडमिनिस्ट्रेशन ने भारत सरकार पर ईरानी तेल की खरीद कम करने के लिए दबाव डाला। पहले ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ भारत के व्यापार को और सीमित करने के लिए 'अधिकतम दबाव अभियान' शुरू किया था। नतीजतन, ईरान 2007 में भारत के कच्चे तेल आयात का 17% सप्लाई करता था, जो 2020 में लगभग शून्य हो गया। अमेरिका रूस के रक्षा निर्यात से भारत को दूर करने में कम सफल रहा है, हालांकि उसने कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रणनीतिक परोपकार की कहानी फिर भी, पिछले कुछ सालों से वॉशिंगटन में भारतीय 'कृतघ्नता' की शिकायतें बढ़ रही हैं। 'रणनीतिक परोपकार' की यह कहानी भारत के अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने पर जोर देने से बढ़ती निराशा के साथ जुड़ गई है। अमेरिकी सरकार तब निराश हुई जब 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ टकराव के बाद भी भारत ने अमेरिका के साथ गठबंधन नहीं किया। रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिम का साथ देने से नई दिल्ली के इनकार पर भी उसे गुस्सा आया। ट्रम्प के कड़े रवैये ने इस दरार को और भी अधिक स्पष्ट कर दिया है, लेकिन उनकी मांगें अपने पहले वालों जैसी ही हैं। अधिक मार्केट एक्सेस, रूस (और ईरान) पर कम निर्भरता, और चीन के साथ मुकाबले में अमेरिका को अधिक सपोर्ट। मौजूदा संकट के दौरान, नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों ने संकेत दिया है कि वे पार्टनरशिप को महत्व देते हैं और इसे बनाए रखना चाहते हैं। हालांकि, रणनीतिक परोपकार का भ्रम अवास्तविक उम्मीदों और नाराजगी को बढ़ावा देकर रिश्ते को खतरे में डालता है। वॉशिंगटन जितनी जल्दी इस भ्रम को छोड़ देगा, पार्टनरशिप के लंबे समय के स्वास्थ्य के लिए उतना ही अच्छा होगा। (लेखक नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज में विजिटिंग रिसर्च फेलो हैं।) लेखक के बारे मेंअनिल कुमारअनिल कुमार नवभारत टाइम्स डिजिटल में होम पेज टीम का हिस्सा हैं। अखबार के साथ ही डिजिटल मीडिया में करीब 16 साल का अनुभव है। जनवरी, 2021 से नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़े हैं। होम पेज पर भारत और दिल्ली सेक्शन के लिए पॉलिटिक्स, करंट अफेयर्स से जुड़ी खबरें और विश्लेषण लिखते हैं। हरियाणा में दैनिक भास्कर और चंडीगढ़ में दैनिक जागरण के लिए स्पोर्ट्स और एजुकेशन रिपोर्टिंग कर चुके हैं। राजस्थान पत्रिका, जयपुर और अमर उजाला, नोएडा में सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में ग्रेजुएशन और पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है।... और पढ़ें

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    भारत-अमेरिका संबंध: रणनीतिक परोपकार का मिथक टूटा?