Health & Fitness
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बढ़ता मोटापा: बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा
Jagran
January 20, 2026•2 days ago

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बढ़ता मोटापा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। सहपाठियों द्वारा चिढ़ाए जाने से उनका आत्मविश्वास कमजोर हो रहा है, जिससे वे स्कूल जाने से कतरा रहे हैं। फास्ट फूड, मोबाइल का अत्यधिक उपयोग और आउटडोर गेम्स से दूरी इसके मुख्य कारण हैं। समाज के हर वर्ग में यह समस्या देखी जा रही है।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। बच्चे मन के सच्चे, लेकिन तन के भारी-भरकम। कम आयुवर्ग में अपने सहपाठियों से दोगुनी उम्र और देह-दशा के दिखने के चलते वे पढ़ाई से भागने लगे हैं। सीखने-गुणने की उम्र में उनका करियर संकट में है। बढ़ता मोटापा बच्चों की मानसिक सेहत और पढ़ाई दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
पहले जो बच्चे स्कूल गतिविधियों में आगे रहते, वे अब कक्षा में पीछे बैठने लगे हैं। नए दौर में कुछ इसी तरह की समस्या लेकर अभिभावक मनोचिकित्सक के पास पहुंच रहे हैं।
पिता ने सुनाया दर्द
पिता ने कहा, तीन साल पहले तक बेटी स्कूल की कक्षा में सबसे पहले जाकर बैठती थी। समय की पाबंद और पढ़ाई में भी हमेशा आगे रहती थी, लेकिन अब वह स्कूल जाने से बचने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाती है। उसका रिजल्ट उतरोत्तर खराब हो रहा है, बात करने-बताने में भी संकोच करने लगी है।
कारण पूछने पर बताया कि सहपाठी उसे मोटी कहकर चिढ़ाते हैं। इससे परेशान हूं, आत्मविश्वास कमजोर हो गया है। कई माता-पिता मनोचिकित्सकों के सामने उनकी मोटापा के चलते मायूस नजर आते हैं। वर्तमान में रोजाना दो-चार अभिभावक अपने बच्चों को लेकर मनोचिकित्सक के पास पहुंच रहे हैं।
लाइफस्टाइल ने बिगाड़ा मानसिक संतुलन
मनोचिकित्सक ने काउंसिलिंग के दौरान ये जाना कि जो बच्चे पहले स्कूल गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे, अब पीछे की बेंच पर बैठने लगे हैं। स्कूल जाने से बचते हैं, अधिक समय मोबाइल पर बिताते हैं। प्रश्न का जवाब जानते हुए भी कक्षा में हाथ नहीं उठाते, जिससे उनका सही मानसिक विकास नहीं हो रहा।
इन बच्चों की खान-पान की आदतों की जांच में सामने आया कि अधिकांश बच्चों को बचपन से ही फास्ट फूड की आदत है। घर के भोजन के बदले वे बाजार के जंक फूड से भूख मिटा रहे। होम डिलीवरी की सुविधा से ये बच्चे खुद भोजन मंगाने लगे हैं।
फ्लैट संस्कृति, आउटडोर गेम्स से दूरी ने उनका वजन और बढ़ा दिया है। डॉक्टर के अनुसार यह परेशानी समाज के हर वर्ग में देखी जा रही है। वहीं कामकाजी अभिभावक समय रहते बेटा-बेटी के मोटापे पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
जेएलएनएमसीएच और सदर अस्पताल में भी हर माह 10 से 15 मोटापा से जुड़े मामले सामने आ रहे हैं। मनोचिकित्सक डॉ. पंकज मनस्वी कहते हैं कि अभिभावकों को समय रहते जागरूक होना जरूरी है। बच्चों को फल, सलाद व सब्जियां खाने की आदत डालें। मोबाइल से दूर रखकर योग-खेल से जोड़ें।
'नकचपटा' कहने से टूटा मनोबल
अमरपुर के आनंदपुर निवासी सौरभ कुमार का नाक बचपन से ही चपटा था, जिस कारण गांव के लोग और दोस्त उन्हें ‘नकचपटा’ कहकर चिढ़ाते थे। बचपन से लेकर 22 वर्ष की उम्र तक यह ताना सहते-सहते वह मानसिक रूप से बीमार हो गया। अंतत: उसने जेएलएनएमसीएच के ईएनटी विभाग में संपर्क किया और नाक की सर्जरी कराने की इच्छा जताई।
ईएनटी विभागाध्यक्ष ड. धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि अस्पताल में पहली बार राइनोप्लास्टी सर्जरी करने का निर्णय लिया गया। सोमवार को सभी आवश्यक जांच के बाद उसकी सर्जरी की गई। डॉ. धर्मेंद्र के नेतृत्व में डॉ. रैबत रहमान और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र कुमार की टीम ने घंटों तक चली सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।
सर्जरी के बाद सौरभ की नाक का आकार सुधार दिया गया। सौरभ कुमार ने कहा कि अब कोई उसे ‘नकचपटा’ कहकर नहीं चिढ़ाएगा। उसने बताया कि शारीरिक रूप से कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन मानसिक रूप से वह काफी आहत रहते थे।
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